मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

कहानी क्यों ज़रूरी है कक्षा में।

कहानी मजबूर करती है बच्चों को शिक्षक के करीब आने के लिए

फिर से कहूँगा, आजकल एक ही है जो दीमाग में नाचता रहता है स्कूल जाते वक्त। बात बहुत पुरानी है यही कुछ स्वतन्त्रता से पूर्व की। एक इंसान था जिसे हम गिजु भाई के नाम से जानते हैं। वह शिक्षकों से कहते हैं- “लीजिये, ये हैं बाल-कथाएँ। आप बच्चों को इन्हें सुनाइए। बच्चे इनको खुशी-खुशी और बार-बार सुनेंगे। आप इन्हें रसीले ढंग से कहिए, कहानी सुनाने के लहजे से कहिए। कहानी ऐसी चुनें, जो बच्चों की उम्र से मेल खाती हो। भैया मेरे, एक काम आप कभी न करना। ये कहानियाँ आप बच्चों को रटाना नहीं। बल्कि, पहले आप खुद अनुभव करें कि ये कहानियाँ जादू की छड़ी-सी हैं।
यदि आपको बच्चों के साथ प्यार का रिश्ता जोड़ना है तो उसकी नींव कहानी से डालें। यदि आपको बच्चों का प्यार पाना है तो कहानी भी एक जरिया है। पंडित बन कर कभी कभी कहानी नहीं सुनना। कील की तरह बोध ठोकने की कोशिश नहीं करना। कभी थोपना भी नहीं। यही तो बहती गंगा है। इसमें पहले आप डुबकी लगाएँ, फिर बच्चों को भी नहलाएँ।”
बच्चों के भीतर असंख्य जिज्ञासाएँ हैं। लेकिन उनकी जिज्ञासा जीवन के बोझ तले इतना दब गया है कि वह उसे बाहर निकालने की कोशिश भी नहीं करते। करें भी तो क्यों? आखिर उससे किसी को क्या फर्क पड़ता है? कौन पूछता है उनके प्रश्न को? कौन जानना चाहता है उनके दिल की बात को? वह तो गीली माटी की तरह है जिसे लोग आकार देने में लगे रहते हैं। किसी ने सोचा ही नहीं कि वह माटी का मूरत नहीं एक भरा-पूरा इंसान है और इसके भीतर भी असंख्य समवेदनाएं हैं, जो समय-समय पर बलबत्ती होती है और पहाड़ जैसी दुनिया से टकड़ा उनके भीतर ही दफन हो जाती है इसलिए स्कूल आते हों बस क्योंकि उन्हें आना था, क्योंकि उन्हें भेज दिया गया है, क्योंकि सरकार ने विद्यालय खोला हुआ है, क्योंकि वहाँ शिक्षक हैं, क्योंकि वहाँ मध्याहन भोजन मिलता है, क्योंकि वहाँ छात्रवृति मिलती हैं, क्योंकि वहाँ पढ़ाई होती है। क्योंकि वहाँ से जब वह निकलेंगे तो उसे समाज में सम्मान मिलेगा।
पर वह बच्चा जो स्कूल आया था पहली बार कई सवालों को लेकर, गुलाब का फूल लाल ही क्यों होता है? तितली उड़ती क्यों है? बादल बरशता क्यों है? पत्तियाँ हरी क्यों होती है? किसी को फर्क ही नहीं पड़ता। फर्क नहीं करता किसी को कि भगवान ने बच्चे को मुह दिया है तो बोलने के लिए, लेकिन उससी मुह पर उंगली रख कर उसे शांत कर दिया जाता हैं। उन्हे कान दिया गया है तो सुनने के लिए, लेकिन कान ऐंठ कर उन्हें सुनने से ही बेदखल कर दिया जाता है। वह अपनी आँखों से जो कुछ देखते हैं, कानों से जो कुछ सुनते हैं, उसे मुह से बोल नहीं सकते केवल कागज और कलम से लिख सकते हैं। लेकिन आजकल तो लेखन पर भी इतना हमला हो चुका है कि बच्चे लिखने के नाम पर दस बहाने बनाते हैं, डरते हैं, हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि लिखने में थोड़ी गलती भी हुई कि उसके खानदान के 7 पुसतों को ले आया जाएगा, जब वह पढ़ नहीं सके तो तुम क्या पढ़ोगे? जब हम सभी जानते हैं, पढ़ाई कोई बीमारी नहीं है जो वंशानुगत हो, यह कोई संक्रामक भी नहीं जो एक व्यक्ति से दूसरे में फेल जाये। यह तो अभ्यास है, यह अनुभव है, जिसका क्षितिज जितना बड़ा वह उतना बड़ा जानकार है।  
इसलिए कक्षा शिक्षण में जो तीन महत्वपूर्ण बाते हैं (जो मैं समझता हूँ) वह इस प्रकार है –
शिक्षा में कर्म को महत्व देना
कक्षा शिक्षण आसान नहीं है। खासकर आजके समय में आप सीधे कक्षा में जाकर भाषण देना प्रारम्भ नहीं कर सकते हैं नहीं किसी बच्चे को रटने पर मजबूर कर सकते हैं नहीं उसे डरा-धमका कर पढ़ाया जा सकता है। पढ़ाई का स्वरूप भी व्यक्ति के भोजन के जैसा है, भोजन कितना भी स्वादिष्ट क्यों न हो व्यक्ति उसे खाने के लिए तभी प्रेरित होता है जब उसे भूख लगी हो बिना भूख के खाना खुद पर अत्याचार करने जैसा है। वह भोजन उसके लिए ज़हर भी हो सकता है जो जीवन दायनी है। पढ़ना-लिखना भी उसी प्रकार के बच्चे के भूख से जुड़ा हुआ, उसे वर्तमान पृदृश्य में किस प्रकार से पढ़ाई-लिखाई मदद करेगी वह उसके लिए लालायित रहता है। परंतु विद्यालय में जो पढ़ाया-लिखाया जाता है वह पूर्णतः उसके परिवेश से कटा हुआ होता है। बच्चों के उस ज्ञान से कोई लाभ लिया ही नहीं जाता जो वह जानते हैं, जो वह अपने घर, अपने परिवेश से लेकर आए हुये हैं। आखिर शिक्षा तो इसी लिए है कि वह प्रकृति एवं परिवेश से ताल-मेल मिलाकर चलें।
परंतु हमारी शिक्षा वयवस्था ऐसी होगी है जिसमें न तो प्रकृति के लिए कोई सम्मान है नहीं परिवेश के लिए जगह। स्वार्थ एवं अहं का इतना बोल-बाला है कि जीवन समाज से हटकर व्यक्तिनिष्ठ होने लगा है। बच्चे अपराधी बनने लगे हैं और हम या तो अपराधी बना रहे हैं या तमाशबीन। इन दोनों के बीच में जो प्रतिकार करने वाला हो वह मानवीय सभ्यता तो विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है।
ऐसे में एक बड़ी चुनौती खड़ी है भारतीय शिक्षा पद्धति एवं शिक्षकों के बीच में कि वह कौन सी शिक्षा को लेकर चले। एक शिक्षा वह जिसमें सभी चाहते हैं कि वह रोजगारपरक हो, दूसरी कि उसमें मानवीय मूल्य भी निहित हो। शिक्षा का पहला रूप हर जगह हावी है जिसके परिणाम स्वरूप शिक्षा के दूसरे पहलू को नज़रअंदाज़ किया गया है। यहाँ प्रश उठता है कि शिक्षा को बाज़ार के हवाले कर हम जीवन के किस ढंग को जीना चाहते हैं साथ ही उस ढंग में मानव का भविष्य क्या होगा? यहीं से कहानी शुरू होती है शिक्षकों की भूमिका का शिक्षा में कि वह पहले जाने कि उनका दायित्व क्या है?
शिक्षा का सीधा अर्थ है व्यक्ति को समर्थ बनाना जिसमें वह स्वयं, समाज एवं देश के लिए निर्णय ले सके। जो व्यक्ति निर्णय लेने में ही समर्थ नहीं है उसका खुद का भविष्य कैसा होगा? अथाह पैसा हों व्यक्ति के व्यक्तित्व को निर्धारित नहीं करता है, बल्कि उस पैसों का वितरण किस प्रकार से हो यह निंधरित करना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए इसलिए शिक्षा को एक सीढ़ी की तरह देखना होगा, जिसमें पहला कदम उतना ही मजबूती से रखना होगा, जितना की आखरी। ऐसे में सभी शिक्षकों को धैर्य के साथ कार्य करना होगा। उन्हें यह बात जानना होगा कि वह पहले दिन ही पढ़ा कर किसी को कामयाब नहीं बना सकते हैं क्योंकि शब्द कामयाबी को भी जानना स्वाभाविक है। जिसके पास काम है, जो काम में व्यस्त है वही कामयाब है। चाहे वह कार्य किसी भी प्रकार का क्यों न हो। एक सुरक्षा में लगा गार्ड, हो या कचड़ा उठाने वाला इंसान हो या कोई बड़ा उद्योगपति जब सबके कार्य को समानता की दृष्टि से दह जाए। उस कार्य को करने वाला इंसान आत्मस्वाभिमान के साथ कैसे जिये जबतक हम इस बात की शिक्षा नहीं देंगे हमारी शिक्षा पद्धति अधूरी ही मानी जाएगी।
शिक्षा से नई दृष्टि का विकास हो
अब हम बात करते हैं वयवसाय की। निसंदेह शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को जीने के लिए, अपने सपने को प्राप्त करने के लिए, अपने उम्मीदों पर खड़े उतरने के लिए सार्थक हो। लेकिन शिक्षा ही उस व्यवसाय को मर्यादित करेगी जिसमें व्यक्ति निरंकुश न हो जाये। किस भी अस्पताल में बैठा डॉ॰ हो या विभिन्न कार्य में लगा हुआ अभियंता या शैक्षिक कार्य में लगा हुआ शिक्षक। एक विधिवत पढ़ाई के करके ये सबकुछ बना जा सकता है, लोग बन भी रहे हैं आगे भी बनते रहेंगे। लेकिन शिक्षा ही वह मजबूत कड़ी है जो निर्धारित करेगी कि इंसान, इंसान पहले है उसका पद बाद में है। हर व्यक्ति एक इंसान के रूप में सम्मानित है, उसका पद तो बस माध्यम है उसके जीवन-यापन के लिए। जब इंसानी महत्व की बात होगी तभी किसी अस्पताल में ईलाज़ कर रहा डॉ॰ अपनी जिम्मेदारियों को समझेगा और वह उसी तत्पर्यता के साथ एक गरीब का ईलाज़ करेगा जितनी तत्पर्यता से वह किसी पैसे वाल का ईलाज करेगा। वह डॉ॰ समझ सकेगा कि रोग की कोई औकात नहीं होती, क्योंकि उसने जो पढ़ाई पढ़ी है वह रोग से मुक्त समाज के निर्माण के लिए पढ़ा है, नाकि अपना बैंक बेलेन्स बढ़ाने के लिए। शिक्षा ही वह माध्यम है कि जब कोई अभियंता कुछ निर्माण करेगा तो यह ध्यान में रखेगा कि वह जो कुछ भी निर्माण कर रहा है वह मानवीय इतिहास में अमर रहेगा, उससे युग-युग तक लोगों का कल्याण होगा। उस निर्माण से उसका भी भविष्य लाभान्वित होगा।
आज बाज़ार ने लोगों एक विचार को संकुचित कर डाला है। वैचारिक रूप से लोग पंगु होते जा रहे हैं। अपना घर भर लेना जीवन की सार्थकता समझी जाने लगी है। स्वार्थ की इस चरमावस्था से कुछ भी शेष नहीं बचेगा। बहुत पहले किसी ने कहा था कि समाज व्यक्ति के लिए अनिवार्य है, समाज से बाहर या तो व्यक्ति रह सकता है या फिर राक्षस। ऐसे में अपने ही समाज से प्रतिस्पर्धा किस लिए है, क्या साबित करने के लिए है? ये कमी रह गई है शिक्ष व्यवस्था में शैक्षिक तंत्र में जो वह शिक्षा को समझ नहीं पाई है। यह कमी है हमारी जो हम उनलोगों को नज़रअंदाज़ करते रहे हैं, जो कार्य करते रहे। कर्म में लीन रहे। स्वार्थ से परे जाकर उस समाज के निर्माण में लगे रहे जिससे आने वाला भविष्य लाभान्वित हुआ।
याद करिए वह ज़माना जब सूर्य के छिपने के बाद संसार में राज हुआ करता था, चोरों का डाकुओं का, लूटेरों का, भूतों का डायनों का। भूत, प्रेत, डायन के डर ने मंदिर, मस्जिद और चर्च का निर्माण करवाया। अंधेरे के उस डर से मानवीय सभ्यता युगों-युगों तक शोषित होती रही। इस भाय के कारण एक वर्ग सभ्यता के चरम पर पहुँच गया तो दूसरा जीवन प्रयंत दलित होकर जीवन-यापन करने के लिए मजबूर हुआ। चंद मुट्ठी भर लोगों का पृथ्वी के सभी संसाधनों पर कब्जा हो गया अरु बहुसंख्यक लोग जो मेहनती थे, जो कर्म में लीन थे, जो दिन-रात एक करके कुछ करने में लगे हुये थे, वह और उनका भविष्य मूलभूत सुख-सुविधाओं से वंचित रहे। उनके पास कोई रास्ता नहीं था क्योंकि धर्म ग्रंथ ऐसे बन रहे थे, जिसमें उनके लिए कोई स्थान नहीं था। सेवा करना केवल मेहनत कश लोगों की पहचान थी। लोग अपनी बुद्धि से नहीं चर्च, मंदिर, मस्जिद से नियंत्रित होते थे। उनमें ईश्वर, भगवान, खुदा का ऐसा खौफ भरा जाता था कि वह मान लेते थे, कि “उनकी गर्दन जिस पाँव के तले दबी है उसे सहलाने में ही भलाई है। उस समय लोगों का ज्ञान सीमित था, क्योंकि लोग एक ही जगह सिमटे हुये थे।
लेकिन जब उस अंधकार को चुनौती दी गई, एक चुटकी बजाते हुये जब हम रात को भी दिन-सा रोशनी में ढालने लगे तो लोगों की धारणा बदलने लगी। यह संभव हुआ उन महान लोगों के कारण जिसने दुनिया की पीड़ा को समझा। उसे आत्मसात किया और निकल पड़े विश्व का कल्याण करने के लिए। वैज्ञानिकों, आविष्कारकों, लेखकों, समाज सुधारकों का एक वर्ग खड़ा हुआ। उन्होने समाज में व्याप्त चुनौतियों को समझा ही नहीं जी-जान लगाकर उसके खिलाफ लड़ाइयाँ भी लड़ी, कुर्बान भी हुए, लेकिन उन्होने जो भविष्य दी, अंधेरे को चीरकर जो रोशनी दी उससे हम आज भी लाभान्वित हो रहे हैं।
शिक्षा आत्मविश्वास में सहायक हो
अतः शिक्षा का स्वरूप ऐसा हो जिसे पाकर दुनिया का हर व्यक्ति आत्मविश्वास से इतना भर जाये कि उस भीतर उस चेतना का विकास हो जिसके माध्यम से हो कह सके कि वह निर्माण करने आया, वह दुनिया को कुछ देने आया है। लेने वालों का कोई इतिहास नहीं होता, विश्व तो कृतज्ञ हुआ उसका जिसने केवल दिया ही दिया है। ढेरों ऐसी कहानियाँ हमारे बीच बिखरी परी है। आवश्यकता है तो उसे समेटने की। बाज़ार ने लोगों के भीतर निराशा, हताशा, अवकुंठा का ऐसा जहर भरा है कि हर इंसान को लगता है कि इस दुनिया में केवल लूटेरे, हत्यारे, बालात्कारी, शोषक, नीच, अधम, पतित किश्म के ही इंसान रहते हैं। वह जान ही नहीं रहे हैं, कि लोग केवल चोरी नहीं करता, केवल लूट नहीं रहा, केवल ठग नहीं रहा, केवल बालत्कार नहीं कर रहा, वह तो निर्माण भी कर रहा है। बड़ी-बड़ी बिल्डिंगे बन रही है, यातायात का जाल बिछ रहा है, लोगों का कहीं से भी कहीं जाना सुगम हो गया है, एक जगह बैठा हुआ इंसान दुनिया के किसी कोने में बैठे किसी दूसरे इंसान के साथ बातचीत कर सकता है।
संसार से डरा हुआ इंसान संसार का असली चेहरा  नहीं देख पा रहा है। वह इतना डरा हुआ है कि हर कोई एक दूसरे से अविश्वास करता है। इस अविश्वास ने दो लोगों के बीच में ऐसी घरी खाई खोद डाली है कि मानवीय समाज एक दूसरे के करीब आने के बजाय और दूर होती जा रही है। इस निराशा ने एक देश के ही लोगों को इतना दूर कर दिया  है कि एक ही सभ्यता-संस्कृति के लोग एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखते हैं। विश्व भातृत्व की कल्पना कैसे साकार हो। आज दुनिया बारूद के ढेर पर सवार है, जिसे बिस्फोट कर उड़ाने के लिए एक मचिश की तिल्ली ही काफी है।
ऐसे में ही शिक्षा ही वह साधन है जो मानवता की ऐसी घनघोर वारिस कर दे जिससे दुनिया का सारा बारूद मिट्टी के ढेर में बादल जाए और ढेर पर उग आए वनस्पति जिससे लोगों को मिले प्राणपद वायु जिसमें मानवता का भविष्य साफ हवा में अपना जीवन-यापन कर सकें।
मानवता की इस नवीन धारणा का शिक्षण होगा कहानी से
अब लौटता हूँ अपनी भूमिका और जिसमें मैंने इंगित किया था गिजु भाई के कथन को। निसंदेह मानवीय समाज की सुंदर कल्पना के लिए शिक्षा का ही सशक्त माध्यम है और वह है कहानी।  समाज में व्याप्त कहानियों के लेकर जब शिक्षक अपने बच्चों के पास जाएगा, तो शिक्षा का आधा कार्य वह कर देगा। कहानी जिसमें निर्माण की गाथा हो, कहानी जिसमें उत्साह हो, कहानी जो बच्चों को आत्मविश्वास से भर दे। कहानी वह नहीं, जो व्यक्ति अपनी अवकुंठा से रचकर सुना रहा हो।
कहानी साधारण नहीं होती, उसमें मुश्किल क्षण आएंगे लेकिन ऐसा नहीं कि उस मुश्किलों से निकला नहीं जा सकता है। कहानी मुश्किलों का ताना-बाना हो, लेकिन तमाम संघर्षों के बाद जीवन में जो सफलता मिलती है उस सुखदाइ परस्थिति से भी कहानी रूबरू करवाए तभी वह कुशल कहानी होगी जो एक नए युग का संचार करेगी।
कहानी सुनाने का मेरा व्यक्तिगत अनुभव
मैं अक्सर विद्यालयों में जाता हूँ। कई जगह तो वहाँ जाता हूँ, जहां बच्चों से पहली बार मिल रहा होता हूँ। उस वक्त उन बच्चों को कहानी सुनाता हूँ। जैसे कक्षा में शेर बाबा’, अगर-मगर’, चबर-चबर’, जो भी करो सोच-समझकर करो। इत्यादि। इन कहानियों को सुनाने के बाद एक जो बदलाव देखता हूँ, बच्चे जो पहली बार मिलने के कारण मुझसे हिचकते रहते हैं, वह  मेरे करीब आने की कोशिश करने लगते हैं। वह मेरा हाथ पकड़ते हैं। वैसे नहीं जैसे किसी का कथन होता है कि वह शिर पर बैठने आ जाते हैं। वह मुझसे बातचीत करते हैं। वह कहानी न भी सुनाएँ, फिर भी बतलाते हैं कि उनके घर में कितनी बकरियाँ हैं, वह उन्हें चुगाने कहाँ-कहाँ ले जाते हैं, उनकी छानिया कहाँ है, वहाँ जाते-जाते रास्ते में क्या-क्या करते हैं। उनमें से कितनों ने रास्ते में जंगली-जानवरों को देखा है, उससे कैसे बचे हैं? जब वह जानवर के नजदीक थे तो वह क्या सोच रहे थे।?
कैसे एक बच्चे के घर में साँप घुस गया  था और उसने पत्थर उठाकर उसे मार डाला था। साँप पर फिर लंबी कहानी, किस-किस ने कहाँ-कहाँ साँप देखा था। क्या सभी साँप जहरीले होते हैं। सांप को मारना चाहिए या नहीं। व्यक्ति का जीवन इतना महत्वपूर्ण क्यों है कि वह किसी भी जानवर को मारने के लिए उतारू हो जाता है। (मैं निष्कर्ष नहीं देता, बच्चे खुद बतलाते हैं, यदि साँप को नहीं मारा, तो रात को वह किसी को भी काट सकता है, किसी अपने की बड़ी हानि होने से अच्छा है जो उस साँप को मार दिया जाए।)
कहानी शुरू होने से एक नए संबंध का सूत्रपात होता है मेरे और विद्यालय के छात्रों के बीच। कहानी सुनकर बच्चे जब घर जाते हैं, तो जो छात्र उस दिन विद्यालय नहीं आए होते हैं, उन्हे भी वह उसी कहानी को सुनाते हैं, जिसे मैंने स्कूल में सुनाया था। अगले दिन जब कभी दुबारा जाता हूँ, तो स्कूल न आने वाला बच्चा भी कहानी सुनाने की गुजारिश करता है।
उच्च प्राथमिक विद्यालय में कहानी का स्वरूप बादल देता हूँ
उच्च प्राथमिक विद्यालय में वह कनही सुनाता हूँ, जो मनोरंजक होने के साथ-साथ बच्चों को थोड़ा सा सोचने-समझने के लिए मजबूर करे। जैसे कलपना चावला गौतम बुद्ध आइन्स्टाइन महात्मा गांधी की कहानी। जिससे बच्चे अपने इतिहास वैज्ञानिकों को भी जान सकें, समझ सकें।
इसमें कहानी का स्वरूप उनकी जीवनी नहीं होती है, उनके  जीवन की कोई एक महत्वपूर्ण घटना को लेकर निर्मित किया गया होता है, जैसे गांधी जी का नमक आंदोलन, जिसके माध्यम से नमक के महत्व से लेकर उसके बनने तक के बारे में विस्तार से चर्चा होती  है, गुलामी पर बातचीत होती  है।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है, पढ़ाई को रुचिकर और शिक्षा को मानवीय मूल्यों से जोड़ने में कहानी एक सर्वोत्म माध्यम के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है। कहानी में पूरी स्वतन्त्रता होती है कि बच्चे कुछ भी प्रश्न पूछे, उन्हें प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। शिक्षा का भी यही उद्देश्य से है कि बच्चे जितना प्रश्न पुछेंगे शैक्षिक कार्य उतने ही कुशलता से संपादित किया जा सकता है। वह शिक्षण निष्क्रिय शिक्षण माना जाएगा जिसमें छात्र कोई प्रश्न ही नहीं पूछ रहे हैं।
छात्र प्रश्न नहीं पूछ रहें मतलब जो कुछ पढ़ाया जा रहा है उसे वह अपनी ज़िंदगी से नहीं जोड़ पा रहे हैं। शुरुआती दौर में प्रश्न छात्र न भी पूछे फिर भी उनके भीतर जिज्ञासा का संचार करना पड़ता है। कि कहानी में अमुक घटना कैसे हुई थी, एक जगह कहानी सुनते वक्त एक बच्चा ने मुझसे प्रश्न किया था कि –“क्या जानवर भी मनुष्य की तरह बोल सकता है”। ऐसे प्रश्न की कल्पना मैंने नहीं की थी, इसलिए बच्चों के बीच ही उस प्रश्न को भेज दिया, तो बच्चों में से ही कई प्रकार की प्रतिक्रिया आने लगी। एक बच्चे ने तो यहाँ तक कहा कि हो सकता है, नीरू शेरो की भाषा जानती हो।
खैर कहानी सुनाकर मज़ा आता है, खासकर तब और जा  मेरी कहानी सुनने के बाद  बच्चे भी अपनी कहानी सुनाने के लिए प्रेरित होते हैं। हालांकि ये कम ही जगहों पर होता है जहां बच्चे खुद ही कहानी सुनाने के लिए प्रेरित हो, बाकी जगह अभी मुझे उन्हें बार-बार प्रोत्साहित करना पड़ता है।
लंबे समय तक जिन्हे बोलने न दिया गया हो वह इतनी जल्दी अपनी प्रतिक्रिया देंगे भी तो कैसे? लेकिन मेरा संघर्ष तो बदस्तूर जारी है।

(नोट- ये लेखक के 26 विद्यालयों के अनुभव के आधार पर है। इससे संबन्धित किसी भी प्रकार के विवाद लिए अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन उत्तरकाशी में जाया जा सकता है। )
जितेंद्र कुमार झा

भारतीय भाषा विभाग, ए॰पी॰एफ, उत्तरकाशी 

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