बुधवार, 30 मार्च 2016

bhasha

अथाह सागर है भाषा और हम बूंद को लिए जीते हैं।
भाषा क्या है? आप किसी से भी पूछ लीजिये, जवाब एक ही मिलेगा, “वह माध्यम जिसके द्वारा हम अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।” अब इस परिभाषा पर गौर करें, तो आप पाएंगे, कि भाषा बिजली के स्वीच की तरह है, कि जब आप किसी के सामने जाते हैं, तो उसे ऑन कर देते हैं, और आप बोलने लगते हैं, फिर जैसे ही आपके सामने वाला बोलता है, तो आप स्वीच ऑफ कर लेते हैं, फिर दूसरा अपनी बात को समाप्त करता है और फिर आप स्वीच ऑन करके बोलना शुरू कर देते हैं।
क्या भाषा यही है? क्या भाषा उस समय नहीं होती, जब आप सड़क पर अकेले चल रहे होते हैं? क्या भाषा उस समय नहीं होती, जब आप अकेले बैठे होते हैं? क्या भाषा वहाँ भी नहीं होती, जब आप आँख मूँद कर सोये हुये होते हैं? क्या कोई भाषा विहीन दुनिया की कल्पना कर सकता है?
जी नहीं, हम भाषा के बिना इस दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते हैं। भाषा हर जगह मौजूद है। हमारे सोचने में भाषा है, हमारे चलने भाषा है। किसी से बातचीत करना तो बस उस भाषा का एक उपयोग मात्र है। हम रास्ते में चल रहे हैं, कोई भी पदार्थ देखते हैं और उसके बारे में सोचने लगते हैं। अब ये सोचना किस में हो रहा है, वह भी तो किसी भाषा में ही सोचा जा रहा है। अगर सिर्फ और सिर्फ भाषा का कार्य विचारों का आदान-प्रदान करना होता, तो ज़रा सोचिए, इतने विपुल मात्रा में साहित्य का निर्माण हो पाता।
अतः हम भाषा की जिस परिभाषा को लेकर चलते हैं, वह हमे एक सीमित दायरे में रखता है। भाषा पर किसी का अधिकार नहीं है, भाषा किसी की वयक्तिगत संपत्ति भी नहीं है। भाषा हरेक व्यक्ति की अपनी है। हर व्यक्ति अपनी भाषा में सोचता है, अपनी भाषा में कल्पना करता है, अपनी भाषा में ही विचारों को रखता है, और अपनी ही भाषा में विचारो को ग्रहण भी करता है।
जब हम एक गुलाब का फूल देखते हैं तो वह हमे सुंदर लगता है, उसकी सुंदरता हम भाषा में ही व्यक्त करते हैं, लेकिन वही गुलाब किसी के आँखों में चुभता है और वह उसे पूंजीवादी का प्रतीक मान लेता है। दोनों ही अपनी अभिव्यक्ति भाषा में ही करते हैं। यहाँ सवाल है परिवेश का समाज का।
बच्चा भी किसी न किसी समाज और परिवेश से जुड़ा होता है, उसने जो कुछ भी उस समाज में रहकर अनुभव किया है, वह बन जाता है उसके भाषा का अंग। आप किसी भी तीन साल के बच्चे से बातचीत करके देख सकते हैं, अपने अनुभव में आए हर चीज़ के बारे में वह बात करने के लिए तैयार होगा। आप किसी भी बच्चे को ले लें, वह जानता है कि कौन सी बात किसे कहनी है। आपने कभी देखा है कि कोई बच्चा पिता से दूध पिलाने के लिए कहता हो, या माँ को घोड़ा बन जाने के लिए।
अर्थात भाषा प्रत्येक बच्चे की भी पहचान है। बच्चा जिस समाज में पलता उसी में जीता है, वह उस समाज के अनुरूप ही भाषा का निर्माण करता है।
अतः अब ज़रूरी है कि भाषा के लिए अनिवार्य कुछ बिन्दुओं पर चर्चा कर ली जाए :
भाषा और समाज : भाषा का निर्माण समाज में ही होता है। समाज ही भाषा के प्रयोग का पहला प्रयोगशाला  है, जहां उस समाज से जुड़ा व्यक्ति शुद्ध एवं परिमार्जित रूप में भाषा का प्रयोग कर सकता है। हर समाज की अपनी मान्यताएं होती है, अपना रिवाज होता है, उनकी भाषा उसके अनुरूप ही होती है, वहाँ का व्यक्ति उसी समाज के अनुरूप ही बोलेगा, क्योंकि उसी के अनुरूप वह सोचता है। इस कारण से आप देख सकते हैं कि खेती करने वाले लोगों की भाषा में किसानी से जुड़े श्ब्दावलियों का प्रयोग ज्यादा होगा वहीं कार्यालय में कार्य कर रहे लोग ज़्यादातर कार्यालयी शब्दों का प्रयोग करते दिखेंगे।
भाषा और अस्मिता : समाज के साथ हर व्यक्ति की अपनी एक पहचान होती है। व्यक्ति समाज के घेरे से निकल कर अपने बारे में भी कुछ विचार रखता है। यह अस्मिता हर किसी से जुड़ा हुआ है। कोई अपनी भाषा में उर्दू के शब्दों का प्रयोग करता हुआ दिख सकता है, तो कोई संस्कृत बहुल शब्दावली का प्रयोग करता हुआ नज़र आ सकता है। भाषा की तो पहचान ही यही है, एक ही भाषा में, एक ही समाज में कई कई तरह के प्रोक्ता हो सकते हैं। उन सभी प्रोक्ताओं का अपना सम्मान और स्वाभिमान है। मराठी हिन्दी, और मेरठी हिन्दी दोनों ही हिन्दी है, पर दोनों ही भाषाओं को बोलने वाले की अपनी एक खाश पहचान है जिसके आधार पर उन्हें पहचाना जा सकता है।
भाषा और लिंग : भाषा को प्रभावित करने वाला यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है। लड़कियों की भाषा में एक सौम्यता होती है, जो समाज ने उसे दी है, बहुत से ऐसे काम जो उसके लिए प्रतिबंधित है, इसलिए बहुत से ऐसे शब्द जिसे वह बोल नहीं सकती है। वही शब्द लड़के कहीं भी कभी भी बोलने के लिए आज़ाद है। पुरुष अपने बातों को लादने के लिए शब्दों का जाल बनाता है, उसकी भाषा में शासन करने वाला अधिकार होता है, जबकि परंपरा से परिवार को चलाने वाली स्त्री के शब्दों में दासता का भाव होता है। हालांकि अब हालात बादल रहे हैं, लेकिन कुछ शहरों को छोड़ दें तो अधिकांश जगहों पर अभी भी वही हाल है। स्कूलों में भी साफ सफाई के कामों के लिए लड़कियों को ही लगाया जाता है।
भाषा का आर्थिक आधार
आज जीवन-यापन के लिए सबसे आवश्यक वस्तु है धन अर्थात पैसा। पैसा जीवन की व्यवस्था को तय करता है। यह समाज में आपके औचित्य को प्रतिस्थापित करता है। यदि किसी के पास अफरात पैसा है, तो वह किसी भी समुदाय का सम्मानित व्यक्ति है। उसके बोल-चाल में जो अकड़ और आत्मविश्वाश होगा वह खाली जेब बाले इनशान के लिए मुश्किल है। आर्थिक रूप से सक्षम इंसान के नियंत्रण में बाज़ार है और आज का बाज़ार ही व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्धारित करता है। जो बड़ा खरीदार है वह सभ्य समाज का नियामक है, जो नहीं खरीद सकता वह उस समाज के लायक नहीं है। प्रेमचंद की कहानी “पूस की रात” के नायक की विवशता यही है जब वह कंबल के लिए जुगाए पैसे को भी महाजन को देता है, तो उससे पहले वह अपनी पत्नी को मनाते हुये कहता है –“तो क्या गाली खाऊँ”। यहाँ यही दर्शाया गया है, कि गरीब लोग सिर्फ जीते हैं, और अमीर जीने के साथ लोगों को रौंदते भी हैं, और उनका यह रूप उनकी भाषा में भी झलकता है।
दूरदर्शन पर आने वाले कई विज्ञापनों को आप देखेंगे तो पता चल जाएगा कि यदि आप में उस कंपनी का सामान खरीदने का सामर्थ्य है तो आप बुद्धिमान हैं नहीं तो आप से बेबकूफ और कोई हो ही नहीं सकता है। अर्थ का यह अंतर भाषा पर विशेष प्रभाव डालती है।
भाषा और बड़े लोग
अक्सर समाज में यह कहते हुये सुना होगा बड़े सम्मानीय लोगों को कि तू तो अभी छोटा बच्चा है है तुझे बोलने का कोई हक़ नहीं है, तुम सिर्फ सुनो। या फिर माता-पिता के द्वारा बार-बार ये जतलाना कि मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या नहीं किया है और तुम मुझसे ज़बान लड़ते हो, अकसर इस तरह की धारणा बच्चों के भीतर एक तरह की संकीर्णता से भर देता है, कि वह तो बड़ों के सामने बोलने लायक ही नहीं है, इससे कई बच्चे जीवन प्रयंत बड़ों के सामने मुह भी नहीं खोल पाते हैं ।
भाषा और जातीयता
भारत तो सिर्फ जातीय आधार के लिए बदनाम है, यह विविधता हर कहीं पाया जाता है, कहीं गोरे-काले का भेद है तो कहीं कबीले के आधार पर अभी भी विभेद चल रहा है। ऐसे में तथाकथित तौर पर जो श्रेष्ठ है, उसकी भाषा दबंगई अंदाज़ की देखी जा सकती है। उदाहरण के तौर पर प्रेमचंद की कहानी “सद्गति” को देख सकते हैं। –“दुखी ने सिर झुकाकर कहा – “बिटिया की सगाई कर रहा हूँ महाराज! कुछ साइत-सगुन विचारना है। कब मर्ज़ी होगी?
पंडित घासीराम –“आज मुझे छुट्टी नहीं। हाँ, साँझ तक आ जाऊंगा।”
इन दोनों संवादों के आधार पर आप देख सकते हैं, एक की ध्वनि में कितनी दीनता है, और दूसरे की आवाज़ में कितना रौब है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भाषा के कितने रूप हैं, हर किसी के पास वह धरोहर के रूप में। यही जीवन का अलंकार है। बचपन में अकसर माँ कहा करती थी, कि यही मुह पान खिलाता है, तो यही मुह जूता भी खिलाता है। अर्थात भाषा वह लचीली चीज़ है, जो समाज, संस्कृति, जाति और अर्थ के आधार पर संचालित होती रहती है। हम जिस दायरे में हैं, लोग उसी दायरे में रहकर हमसे बोलने की उम्मीद करते हैं। ऐसे में कोई दायरा तोड़ कर निकलना चाहता है, उसे असामाजिक तत्व घोषित कर दिया जाता है। हम एक स्त्री से कल्पना नहीं कर सकते कि वह मर्दों की तरह बात करे, बच्चे से यह अपेक्षा रखते हैं, कि वह बस हमारी बातों का अनुसरण करके ही चले। ऐसे में भाषा बस एक पक्षीय हो जाता है, और कुछ नहीं।
विशेष अगले अंक में ___________________________________जारी है________________