बुधवार, 22 जून 2016

jangal jahan se shuru hota hai.

जंगल जहां शुरू होता है (संजीव)
एक जीवन, एक सफर, एक उमंग। यह सब चाहिए पर किसके लिए? क्यों? जंगल का कोई नियम नहीं है, वहाँ जो जितना बड़ा शिकारी है वही वहाँ का राजा है, इसीलिए शेर को जंगल का राजा कहा गया। यही जंगल जब व्यक्ति के जीवन में उभरता है तो क्या दृश्य प्रकट होता है इसका ताना-बना बुना है “संजीव” ने अपने उपन्यास “जंगल जहां शुरू होता है” में।

कोई नायक नहीं, कोई खलनायक नहीं, बस व्यवस्था एक जंगल है, जो व्यक्ति को शक्ति केन्द्रित होने के लिए मजबूर करता है। जी हाँ मजबूर करता है, प्रोत्साहित नहीं। जीवन तो बड़े ही साधारण ढंग से चलता है, खाने के लिए खाना चाहिए, रहने के लिए घर, खुशी के लिए परिवार और उत्सव मनाने के लिए समाज। पर जंगल का राज तो कहता है, मेरे पास शक्ति है, सामर्थ्य है मैं तो पूरा का पूरा लेकर ही रहूँगा। इस पूरे के लिए शुरू होता है शोषण का खेल। एक प्रथा बनती है, शिकारियों और शिकार की। जो कमजोर है, जो लाचार है, जो बेबस है वह शिकार, जिसके पास क्षमता है, जिसमें दुसाहस है, जिसमें कठोरता है, निर्दयता है वह शिकारी।

बिहार के बेतिया जिसे पश्चमी चंपारण के नाम से भी जाना जाता है, वहाँ के थारु जनजाति के आधार पर उपन्यास का कथानक बुना गया है। पर वह बस कथानक का एक अंग है। पूरी की पूरी घटना तो जंगल का वर्णन में ही बिता है। जंगल खूबसूरत नहीं होता, वह प्रकृति के खाद्य शृंखला के लिए सुंदर और बेहतरीन तो हो सकता है लेकिन उसके नियम बड़े ही कठोर होते हैं।

जंगल का नियम है हिंसा और प्रतिहिंसा का। उपन्यास में डाकुओं के नियंत्रण उसके खात्मे के लिए कुछ पुलिस अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं उन्ही में से एक है कुमार। वह नायक नहीं है बस एक पुलिस अधिकारी है। वह डाकुओं को पकड़ना चाहता है, इनाम पाना चाहता है, तरक्की पाना चाहता है और जब किसी चाहत को ध्यान में रखकर कोई कार्य करता है तो वह किसी भी हद तक जा सकता है। वह प्रेम के धोखे में किसी से बलात्कार कर सकता है, किसी से दो बाते मीठी करके उसके राज को जान सकता है। राज को जानने के बाद उसे मौत के घाट उतार सकता है।

उपन्यास लोकतन्त्र का खुला मज़ाक करते हुये हमारी व्यवस्था को उकेर कर रख देता है। उपन्यास में डाकू हैं, पर ये डाकू हैं कौन, वही जो कभी जमींदारों के लठैत हुआ करते थे, जिन पर किसी का नियंत्रण नहीं था, जो कभी भी किसी गरीब जनजाति की ज़मीन हड़प सकते थे, जो कभी भी किसी दलित की बहू-बेटियों की आबरू से खेल सकते थे। जब उन्होने देखा कि ये सब करना कितना आसान है, तो क्यों न अपना दल बनाया जाए, लोगों को लूटा जाए, लोगों की बहू-बेटियों को रखेल बनाया जाए। ऐसे ही बनता जाता है वहाँ एक नया दल। जिसका काम है, अपहरण, लूट, बलात्कार, हत्या, चुनाव में बूथ लूट कर नेताओं की मदद करना।

ऐसे जंगल में कुछ कमजोर जानवर भी रहते हैं, उसी प्रकार का एक परिवार है काली का। उसके परिवार में एक बड़ा भाई है बिसराम, भाभी है, दो भतीजी, जिसमें से एक की साँप के काटने से मृत्यु हो जाती है। परिवार के पास खेती भी थी, पर जमींदारों ने हड़प ली, मामला कोर्ट में है पर कोर्ट किसका, मैंने पहले ही कहा जंगल में जो बड़ा शिकारी, शिकार उसका।

काली कोर्ट कचहरी के चक्कर में परेशान है, बिसराम जमींदार की चिरोरी करने में और उसकी भाभी को पुलिस वाले उठाकर ले जाते हैं कि वह डाकुओं के लिए खाना बनाती है। घर आकार बिसराम पूरी रात परेशान है, बच्ची घर में, उसे कैसे दूध पिलाये, वह आती क्यों नहीं। बच्ची का रोना उससे बरदास्त नहीं होता है, तो वह थारुओं के लिए वर्जित गाय के दूध को बच्ची के मुह में डाल देता है।

सवेरे होते ही दिखाई देती है, लस्त-पस्त बिसराम की बहू आते हुये। एक गरीब जिसका कि ज़मीन जमींदारों ने छीन लिया, डाकू ज़िंदगी छिनने पर आमदा है, और आज पुलिस वालों ने इज्ज़त भी लूट ली। फिर भी जो हुआ सो हुआ, काली डाकुओं के राह पर नहीं जाना चाहता है। वह मेहनत-मजदूरी करना चाहता है। पर मजदूरों को लूटता है ठेकेदार। वह बेगार भी करता है, पर उसे वहाँ से कहीं और भेजा जाता है, वहाँ देखता है, कि उसके साथी नौकर फेंकन की पत्नी का बलात्कार, उसकी मलकाइन खुद करवाती है। उसका मन विद्रोह से भर जाता है और अपने पुराने मित्र नारायण के साथ मिलकर वह भी जंगल के नियमों का शिकार हो जाता है। बन जाता है डाकू। व्यवस्था से हारा हुआ लूटेरा, जीवन से धोखा खाया हुआ शिकारी, नियमों को ताक पर रखने वाल विद्रोही। उसके डाकू बनने की सज़ा मिलती है उसके  पूरे परिवार को।

उपन्यास में सब हैं, लोग है, समाज है, संस्कृति है, देवता हैं, पुलिस है, नेता हैं, सरकार है। पर सब किसलिए। सिर्फ और सिर्फ शोषण करने के लिए। किसी के पास कोई योजना ही नहीं है। सरकार डाकुओं को मारना चाहती है, पर नेता का तो दोस्त है डाकू, वही तो उन्हें वोट के समय मदद करते हैं, सरकार चाहती है जमींदारी प्रथा से निजात, पर यही जमींदार तो नेताओं को पैसा देते हैं चुनाव लड़ने के लिए और सरकार यही नेता तो हैं। अर्थात व्यवस्था जस की तस बनी रहनी चाहिए।
एक पुलिस वाला करेगा भी तो कितना, हर पुलिस की एक जाति है, हर जाति का एक पुलिस है, ऐसे ही डाकू और नेताओं का भी हाल है, हर जाति का एक डाकू, हर डाकू की एक जाति।

संजीव कथा कहते नहीं हैं, वह घटना की ओर इंगित मात्र करते हैं, जो उनकी शैली को लाजवाब बना देती है। उपन्यास पढ़ते वक्त आप एक नायक को ढूँढने की कोशिश करेंगे, पर वह नहीं मिलेगा, कहीं भी नहीं, किसी भी पात्र में नहीं। यदि नायक आप पुराने उपन्यास से ढूंढ कर लाएँगे, तो देखेंगे कि नायकत्व की प्राप्ति के चक्कर में बिसराम का क्या हाल होता है। ज़माना कृष्ण का नहीं है कि अपनी गलतियों को स्वीकारने वाला हो गया नायक से महानायक।
होता होगा किसी सभ्यता में यह सब। यहाँ तो बस नियम चलता है जंगल का। तुमने एक गलती की नहीं कि हो गए ढेर।

उपन्यास में सब है, पर क्यों? लगता है जैसे एक बोझिल, बेकार, लाचार सी ज़िंदगी को जीने के लिए। इस बोझिल ज़िंदगी को सहजता से जीने के लिए चाहिए सत्ता। आज सत्ता नेताओं के हाथ में है। आपको जीना है, शान से जीना है, अपने आत्म्स्वभिमान के साथ जीना है, तो बनिए नेता। फिर पुलिस भी आपकी, डाकू भी आपका।

हर पाँच साल के बाद आने वाला चुनाव भारतीय लोकतन्त्र की रक्षा के लिए नहीं होता है, वह होता है उन डाकुओं के लिए, जो अब कुछ लोगों को लूटते-लूटते इतने थक चुके हैं कि वह कुछ बड़े स्तर पर लूटना चाहते हैं, राजनीति के लिए उनका अनुभव भी काम आता है। इसी प्रकार से उपन्यास का एक पात्र डाकू परुश्राम चुनाव जीत कर एम॰एल॰ए बन जाता है। उसके विरोधियों को मार दिया जाता है। जंगल अभियान समाप्त होता है। कुमार वापस चले जाते हैं।

कुछ था ही नहीं कहीं उस थारु जनजाति के लिए जिससे वह एक दिन की भी सुखद ज़िंदगी जी सकें, बस था तो आतंक जिसके साये में उन्हे पलना था, जीना था। और वह जीना भी इसलिए कि डाकू, जमींदार, पुलिस, राजनेता वक्त, बेवक्त उनसे फायदा निकाल सके।

जंगल के भेड़ियों के लिए कुछ कमजोर जानवर भी तो होने चाहिए, जिनपर वह अपना हवश निकाल सकें।

यह उपन्यास अपने मानदंड पर पूरी तरह से खड़ा है। इसमें न कोई मनोवैज्ञानिक चेनता है, न कोई सामाजिक आदर्शवाद, नीरा अकेलापन तो आप ढूंढ ही नहीं पाएंगे, है तो बस जीवन जीने की उत्कंठा, पीड़ा, आवाज़ उस थारु जनजाति की।

पर भाई ये जंगल है, यहाँ तो सिर्फ शेर की दहाड़ सुनाई देती है। 

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