कविता के नए प्रतिमान के साथ खड़ा है “पेड़ बनी स्त्री”
कविता क्या है? भारतीय
काव्य-शास्त्र की संस्कृत परंपरा से लेकर वर्तमान में नामवर सिंह तक कविता में खास
कर उसकी अभिवयक्ति के तरीके में बहुत अंतर आचूका है। कविता अर्थात “सबसे दुखी क्षण
की वाणी मात्र नहीं है” कविता व्यक्ति के साधारण अनुभवों की भी अभिवयक्ति हो सकती
है। समाज से व्यक्ति इस कदर गूँथा हुआ है
कि दोनों को एक-दूसरे के बिना देखना संभव नहीं है। कविता भावों का चरमोत्कर्ष हो
सकता है। लेकिन भाव सिर्फ और सिर्फ कवि के नहीं होंगे,
श्रेष्ठ कविता वही होगी जिससे पाठक भी कवि के भावों के साथ एकाकार स्थापित कर
लेगा। अनुभूति की अभिवयक्ति का साधारणीकरण ही बेहतरीन रचना की निशानी है।
संस्कृत या जिसे हिन्दी काव्य-शास्त्र भी कहा गया है, वहाँ से लेकर अबतक कविता के स्वरूप में
विशाल परिवर्तन आ गया है। लेखक और पाठक के जीवन का अनुभव तीक्ष्ण-सूक्षम एवं वृहत
हुआ है। कविता एवं उदात्त तत्व का परिप्रेक्ष्य केवल सामाजिक निष्ठा नहीं रही है, एक व्यक्ति का स्वयम के लिए दिया गया समय भी है। अपने को जानना, खुद को जानकर दूसरे के समक्ष अपने को अभिवयक्त करना समसामयिक कविता का
मूल स्वर है। अपने को जानना भी एकांतिक सुख का कारण नहीं है। व्यक्ति खुद को जान
भी रहा है तो सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ही। कि उस विशाल परिदृश्य में मेरी क्या
पहचान है?
“पेड़ बनी स्त्री” नमक काव्य संग्रह कुछ इन्हीं उलझनों के साथ उपस्थित होती है।
उलझन से तात्पर्य कथ्य का उलझन नहीं है,
उलझन है परिवेश का, उलझन है सामाजिक ताने-बाने का। जिसमें हम-आप
सभी रहते हैं। “पेड़ बनी स्त्री” शीर्षक के रूप में ही चौंकाती है। आखिर स्त्री
पहले क्या थी? जो अब पेड़ बन गई। स्त्री के पेड़ बनने तक की एक
विशाल यात्रा हिन्दी काव्य-परंपरा में दिख जाता है। जहां आदिकाल में मात्र वह
उपभोग और विलास की वस्तु थी, मध्यकाल में स्त्री के स्वरूप
में विविधता थी, कहीं प्रेयसी थी तो कहीं विलास की वस्तु के
रूप में व्याख्यायित होती रही। छायावाद की स्त्री अति सम्मान की पात्र बनी, प्रगतिवाद शोषक-शोषण का केंद्र
बना रहा। आधुनिक समय में जब स्त्री स्वतन्त्रता की बात उठी तो लोगों ने समानता और
समान व्यवहार को नहीं समझा उन्होने सोचा पुरुष की तरह स्त्री के साथ व्यवहार करने
से उनकी स्थिति में सुधार आ जाएगा। इस परस्थिति ने स्त्री को पेड़ सा बना दिया। वह
ठूंठ भी हो सकता है तब भी जलावन के काम आ ही जाएगा, हरा-भरा
रहे तो फल, हवा, पानी, दवा, छाया सबकुछ मिल सकता है। अर्थात जिस आर्थिक
विकास के कारण स्त्रियों की स्वतन्त्रता की बात की जा रही है, उसमें वह आदिकाल से लेकर अबतक मात्र उपभोग की वस्तु से बढ़कर लाभदायक उपभोग
की वस्तु बन गई है।
इस काव्य संग्रह में इसी पीड़ा की
व्याख्या है। पीड़ा पुरुष से तुलना करने की नहीं, किसी से ज्यादा स्वयम को श्रेष्ठ घोषित
करने की नहीं। पीड़ा स्त्री के रूप में स्त्री को सम्मान दिलाने की। सामाजिक दायरे
में बंधी स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह सभ्य बेटी बनी रहे, शुशील बहू बनी रहे, आज्ञाकारी पत्नी बनी रहे। यह
दायरा इतना घनिष्ठ एवं संकुचित है जिसमें उनका दम घूंटता है। वह जानती है जो उसके
अपने हैं, वही उसकी राह में कांटे बने हुये हैं, ऐसे भ्रामक स्नेह से बचने के लिए कवयित्रि कहती हैं
‘दुनिया
भर की स्त्रियों तुम जरूर करना प्रेम
पर ऐसा नहीं कि जिससे
प्रेम करना उसी में ढूँढने लगना
आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप।”
ऐसा भी नहीं है कि सामाजिक दायरे ने स्त्री की प्रतिभा को रोक दिया हो। चाहें
कितनी भी लकीरें समाज में खींची हों, जो
भी नियम-कानून बनाए गए हों, उसे तोड़कर खेल के मैदान से लेकर
सपनों की उड़ान तक स्त्रियाँ पहुँच ही जाती है। कौन भूल सकता है, कल्पना चावला, पी॰टी॰ऊषा सरीखी महिलाओं को। इनकी गाथा
का वर्णन करते हुये मुक्ति नामक शीर्षक कविता में कवयित्री लिखती हैं-
“लकीरें एक के बाद
एक, फिर भी छूट ही जाता है
कोई न कोई बिन्दु, जहां से फूटती हैं राहें,
चमकती हैं किरणें
स्त्री जिस परिवेश में जीना शुरू करती है, उसका प्रारम्भ उसके बचपन से ही शुरू हो जाता है। सच कहा जाए, तो स्त्री का बचपन होता ही कहाँ है। वह तो उस ककड़ी की तरह रहती है जिसे
देखकर हर किसी के जी में पानी आने लगता है। 12 वर्ष की हुई नहीं कि दुनिया समाज सब
उसे ललचाई-तीखी नज़रों से देखना शुरू कर देते हैं। एक छोटी बच्ची को परिपक्व बनाने
की शाज़िश में हर कोई लग जाता है। लगे भी क्यों नहीं स्त्री की उन्मुक्तता की वकालत
कौन करेगा, ‘डिब्बाबंद’ अर्थात तैयार माल। अर्थात स्त्री की सौम्यता, उसकी
अनुगामी होने की प्रवृति, लोगों से लाज़-लज्जा करने की अदा, नज़रे झुका कर चलने का सलीका ही सभी को पसंद है। अपने लिए हर कोई ऐसी ही
पत्नी और बहू चाहता है। तो फिर उनकी स्थिति का विरोध करे भी तो कोई क्यों करे?
इस काव्य संग्रह में द्वंद्व नहीं है,
उन्मुक्तता का गान भी नहीं है। कविता है एक स्त्री के रूप में स्त्री को पहचानने
की। स्त्री देवी भी नहीं है, स्त्री सिर्फ और सिर्फ शरीर भी
नहीं है, स्त्री पेड़ भी नहीं है, तो वह
क्या है? वह बेटी है, माँ है, बहन है। परंतु यह बारीक सी बात भी लोगों को समझाना आज के समाज में कठिन
ही नहीं दुष्कर भी हो गया है। इस अवस्था की चरमोत्कर्ष तो “हत्या से ज्यादा”
शीर्षक नामक कविता में होती है। एक बच्ची को, अपनी ही बेटी, बहन को एक सुरक्षित माहौल न देने की पीड़ा क्या होती है? इसे समझना एक उलझन भरा नहीं एक आत्मीय सवाल है। एक उन्मुक्त(मानसिक रूप
से पीड़ित) लड़की दीपाली की स्वछंदता भी लोगों को बरदास्त नहीं होती है। “दीपाली” शीर्षक नामक कविता एक लड़की के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश है
कि किस प्रकार भेड़िये की खाल में हम इंसान बने बैठे हैं और रोज हादसे हमारे सामने
से होकर गुजर जाते हैं। वह आत्मिक प्रेम, वह सांसारिक जीवन
को जीने की कला क्यों पीछे छूटती जा रही है?
यहाँ यह बात ज़ोर देकर कहना चाहूँगा कि लेखिका का उद्देश्य यहाँ कहीं से भी
स्त्रीवादी चेतना को समर्थन नहीं है,
इसमें एक नजरिये की आत्मीयता है समाज के साथ। जो उनकी कविता “एक माँ के होते” में
जहां कुत्सित मानवीय प्रवृति को दर्शाया गया है वहीं “ब्रेक
के बाद” में दलित चिंता उभरकर सामने आती है।
इस प्रकार से इस पूरे काव्य संग्रह की कविता को तीन महत्वपूर्ण विषयों के
अनतर्गत रखा जा सकता है, एक
स्त्री को मात्र शरीर समझे जाने की संवेदना की कविता, दलित
चेतना की कविता एवं प्रकृति चित्रण। वैसे प्रकृति चित्रण को दूसरे दलित ये पिछड़े
लोगों की संवेदना के अंतर्गत रखा जा सकता है। परंतु लेखिका के प्राकृत चित्रण ने
कविता में नए प्रतिमान को व्याख्यायित किया है। गंगा की पवित्रता के नाम पर
अपवित्र करने की परंपरा का पुरजोर विरोध करती हुई वह लिखती हैं, -
तुम चाहते हो मैं बनूँ
गंगा की तरह पवित्र-----------
डाल जाओ उसमे उसमें
कूड़ा-करकट मल अवशिष्ट
धो डालो अपने पाप।”
इस काव्य संग्रह में संघर्ष है,
स्वतंत्र पर ज़िम्मेदारी से बंधा हुआ संघर्ष। कवयित्री पूरे जोश-खरोश के साथ उस
संघर्ष से लड़ने और जीने की वकालत करती हैं। जीवन यदि जंग है,
तो शायद हार भी स्वाभाविक है पर वह खुले तौर पर आमंत्रित करते हुये हारे मन को
उत्साह देते हुये कहती हैं –
गर्व से खड़ा
उपस्थित का भास दे रहा है ठूंठ
फिर से कोंपले
फूटने लगी हैं, उसने हार
नहीं मानी
और ढूंढ ली
जीवन की संभावनाएं
लेखिका जानती हैं कि दुनिया भेड़ियों से भरी-परी है, उसकी आतंकित आंखे आत्मा तक को छेदने के लिए
तैयार है पर उनके स्वर में कहीं भी निराशा नहीं है अपने पहाड़ की औरतों के साहस
विश्वास और दृढ़ निश्चय को प्रकट करती हुई कहती हैं –
हमारे हाथों में थमाओ
कलमें
पकड़ाओ मशालें आओ हमारे
साथ
हम बनेंगी क्रांति की
वाहक हमारी ओर दया से नहीं
बराबरी और सम्मान से
देखो।
“पेड़ बनी स्त्री” कविता संग्रह ‘रेखा
चमोली जी’ की पहली काव्य संग्रह है। पर रचना कौशल एवं
अनुभूति के स्तर पर वह पूरी रूप से परिपक्व दिखती हैं। भाषाई कौशल खास कर प्रकृति
से रंग चुराकर जिस प्रकार से उन्होने कविता में उस रंग के माध्यम से चित्रा उकेरा
है वह अपने-आप में बेमिशाल है। सूरज को छुट्टी पर भेजना हो या लता तथा पेड़ के
माध्यम से मानवीय संवेदना को दर्शाना ये कविता के प्रतिमान के रूप में नए से लगते
हैं। कवयित्री स्वयम स्त्री है, इसलिए स्त्री जीवन से जुड़े
अनुभव उनका भोगा हुआ यथार्थ तो है ही, एक मानवीय दृष्टि से
भी उनकी अनुभूति की प्रामाणिकता घोषित होती है।
शिक्षा, लोकतन्त्र, विकसित देश का स्वप्न देखने वाले भारत में स्त्री,
दलित और बच्चों की स्थिति क्या है? क्या इस ओर किसी का ध्यान
जा रहा है? जो पुरुष समाज विलाशिता के केंद्र में जी रहा है
वह विलाशी स्वरूप उसे अपने ही बहन-बेटियों को असुरक्षित बनाता जा रहा है।
इस कविता संग्रह की प्रत्येक कविता पढ़ने लायक है, जिसकी गहन अनुभूति आपको भीतर तक झकझोड़
डालेगी। यदि मानवीय संवेदना के साथ आप खड़े हैं, तो समझ
सकेंगे कि कितना मुश्किल होता है सिर्फ और सिर्फ किसी के फायदे के लिए जीना।