एकाकी जीवन की झांकी है : जलती झाड़ी
प्रेमचंद के काल तक कहानियों का एक समाज है, एक दुनिया है। उस दुनिया का व्यक्ति समाज में जीता है, अर्थात समाज के भीतर के व्यक्ति की संवेदना समाज के साथ जुड़ी हुई है।
रेणु भी उसी समाज को लेकर चलते हैं, लेकिन जब वह समाज टूटता
है, और व्यक्ति ग्रामीण समाज को छोड़कर एक पराए शहर में आता
है, तो वह नीरा अकेला व्यक्ति ही रह जाता है। ग्रामीण
संस्कृति से टूटा हुआ व्यक्ति जिस शहरी संस्कृति में खुद को तलाशता है वही है नई
कहानी।
नई कहानी का व्यक्ति खुद के भीतर के इंसान को ढूँढता है, छटपटता है, पीड़ित
होता है, उसके पास समाज नहीं है बात करने के लिए इसलिए खुद
से ही बात करता है। खाली चौबारे पर खड़ा वह लैम्प पोस्ट को ताकता है, पत्तियों के खड़खड़ाने की आवाज़ को सुनता है, खाली पड़े
घर की खिड़कियों की चरमराहट सुनता है। निर्मल वर्मा अपनी कहानियों में इसी इंसान की
बात करते हैं।
आज इंसान अपने वजूद के लिए लड़ रहा है,
उसके पास परिवेश है पर खाली, उसके पास आत्मज्ञान है पर द्वंद
के साथ, वह चौराहे पर खड़ा तय नहीं कर पा रहा है कि उसे किस
ओर जाना है। इस अनिश्चितता की घड़ी में वह प्यार ढूँढता है। उस प्यार के लिए वह
घंटो खड़ा प्रतीक्षा करता है, लेकिन जिस भारतीय समाज के
किस्से और कहानियो में प्रेम है उसे हककीकत में बदलना आसान नहीं है। प्यार के लिए
छटपटाहट के बाद भी व्यक्ति का द्वंद इतना हावी हो जाता है कि उसके पास यह निर्णय
लेने की क्षमता नहीं रह जाती कि वह अपने जीवन को चुने या संघर्ष को।
“लवर्स” का नायक, नायिका से
प्यार करता है, वह उसे पत्र भी लिखता है, वह लड़की का इंतज़ार करता है, लड़की आती भी है, दोनों स्मृति में जीते भी हैं। पर हाथ क्या लगता है, कुछ भी नहीं, जिससे प्रेम करो वह बेहतर की तालाश में
है और जो प्रेम करता है, वह भटकता है। यह कहानी क्यों है? कैसे है? जानने के लिए पूरी तरह से अपने समाज को
जानना ज़रूरी है, जिसमें प्रेम जो केवल पवित्र माना गया है, कल्पना माना गया है। इससे आपका जीवन जुड़ा है यह कोई भी स्वीकार करने के
लिए तैयार नहीं है। कहानी यह भी बयां करती है, कि प्रेम में
विफल व्यक्ति किस प्रकार से अश्लील साहित्य की ओर दौड़ता है। एक उदाहरण देखें
“मैं पीछे मुड़ गया और तेज़ी से कदम बढ़ाता हुआ अमरीकी पत्रिकाओं की दुकान के
सामने आ खड़ा हुआ। पुरानी पत्रिकाओं का ढेर मेरे सामने बेंच पर रखा था। मैं उन्हें
उलट-फेरकर नीचे से एक मैगज़ीन उठा लेता हूँ। वही कवर है, जो अभी कुछ देर पहले देखा था। वही बीच का दृश्य है, जिस
पर अर्धनग्न युवती धूप में लेटी है।”
प्रेम में विफलता केवल व्यक्ति को तोड़ता ही नहीं उसे अवकुंठा के साथ जीने के
लिए मजबूर कर देता है, उस प्यार
के लिए वह दौड़ता है, भागता है, पर
किस-किस से भागे, प्रेम की संवेदना तो भीतरी वस्तु है। यह
शारीरिक इच्छा भी है जो पराए शहर में भी इंसान को पीड़ित करती रहती है। इसी शारीरिक
पीड़ा का प्रतीक है “जलती झाड़ी।” उस पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए दुनिया के युवा
झाड़ी की तलाश में है, जो कहीं भी किसी भी देश के कौने में
मिल सकता है। जीवन के असीम आनंद को व्यक्ति जब झाड़ियों में कैद पाता है तो उसके मन
से आवाज़ आती है, “मुझे आज भी यह सोचकर अपने पर हैरानी होती
है कि मैं वहाँ से चला क्यों नहीं आया। जो कुछ झाड़ी के पीछे हो रहा था, उसके प्रति मेरे मन में न कोई जिज्ञाशा थी, न
जुगुप्सा...... कौतूहल भी नहीं। फिर भी मेरे पाँव नहीं उठे,
मैं जड़वत बैठा रहा।”
व्यक्ति के खुद की पीड़ा उसे मुक्त नहीं करती उसे बांधे रखती है, और यही पीड़ा निराशा में बदलकर उसे
अत्महत्या के बारे में सोचने के लिए मजबूर करती है। मरना केवल शरीर से मुक्ति नहीं
है, शरीर के साथ पीड़ा को झेलना भी मौत ही है, जिसके बारे में लेखक लिखता है “जैसा आप देखते हैं,
मैंने उस रात अत्महत्या नहीं की। उसके बाद भी नहीं, लेकिन यह
जानते हुये भी कि मैं जिंदा हूँ, पतझड़ की उस शाम के बाद
अक्सर शंका होने लगती है कि मरने के लिए आत्महत्या बहुत ज़रूरी नहीं है……”
निर्मल जी पाश्चात्य संस्कृति और पब संस्कृति से बखूबी परिचित हैं। बकायदा
समूची शब्दाबली वे अपने साहित्य में करते हैं। यहाँ ध्यान देने की बात है, कि वह कौन से परिस्थितीय तंत्र है कि वर्मा
जी सिगरेट और शराब में ज़िंदगी ढूंढते हैं? इसका सीधा सा मतलब
है, ज़िंदगी प्यार है, अपनों के बीच में
है, और जब यह सब नहीं रहा, तो उस
ज़िंदगी का क्या अर्थ है, ऐसे में यदि मौत आ भी जाती है, तो निराशा की ज़िंदगी से बचना ही तो है।
मौत और ज़िंदगी के बीच में निर्मल वर्मा जी “माया दर्पण” का निर्माण करते हैं।
अतीत की और भविष्य की सुखद और दुखद स्मृतियों के मोह की माया। दर्पण झूठ है, कुछ बर्षों में सबकुछ बादल जाएगा की स्मृति
मन को एक झूठा किन्तु सुखद आश्वासन देती है, हालांकि यह झूठा
और भ्रमपूर्ण आश्वासन है इसलिए यह माया है।
यही भ्रम व्यक्ति को भटकने पर मजबूर कर हमेशा एक शुरुवात करने के लिए समय देती
है। व्यक्ति जब अपने जड़ से ऊखर कर एक नई दुनिया में जाता है, तो वह स्मृति में अपने बारे में अपने देश
अपने समाज के बारे में सोचता है। अपने समाज में ठेश खाये श्रीचन के लिए कोई उम्मीद
से आता है, और टाट की पट्टी बुनने के लिए कहता है, वह नायक चोट खाकर भी किसी और की उम्मीद, सपनों के
लिए जीता है, अपमान के बाद भी समाज में रह रहे इंसान का एक
सपना है। यही तुलना है “रेणु” और वर्मा की। वर्मा उस व्यक्ति
की बात करता है जहां वह अंजान है, रेणु वहाँ की बात करते हैं, जहां व्यक्ति को कोई जनता है, उसके गुणो से वाकिफ
है। पर निर्मल वर्मा का नायक अंजान देश में जहां उसे कोई नहीं जनता, वहाँ वह नायक खुद से भी उतना ही अंजान है।
निर्मल वर्मा के साथ नई कहानी के सभी कहानीकार के व्यक्ति के भीतर भी एक
व्यक्ति है, जिसे
ढूँढना उसकी सबसे बड़ी चुनौती है। यही चुनौती व्यक्ति को अन्तर्ज्ञान की ओर ले जाता
है। उदाहरण देखें : - “मैं अपने देश से हजारो मील दूए, यहाँ
क्यों चला आया हूँ? मेरे लिए यूरोप के क्या अर्थ रहे हैं? क्या यूरोप मेरे लिए महज़ अपने से बचाव का ही साधन रहा है- उन सब विवशताओं
से पलायन, जो सोते-जागते भुतैली छाया-सी मुझ पर मंडराती रहती
थीं, या उससे कुछ अधिक? एक शब्द
बार-बार ध्यान में आता है – अनत्रज्ञान! शब्द बहुत पुराना है......सिननोग के टूटे
पत्थर-सा। जितना वह बड़ा है, उसके सामने अपने को उतना ही छोटा
पाता हूँ। किन्तु महीनों पहले यह शब्द इतना भारी नहीं लगता था।”
कमलेश्वर की ज़िंदगी अपने ही देश में खो गई है, और वह खोई हुई दिशाओं में ही खुद को तालाश रहे हैं, कमलेश्वर की भटकी हुई ज़िंदगी केवल भारत की ही कहानी नहीं है, यूरोप में भी रात है “लंदन की एक रात” जहां निर्मल वर्मा मुद्दत सिगरेट
नहीं पी पाते, अर्थात अपनी तरह से ज़िंदगी नहीं जी पाते हैं।
व्यक्ति खुद की तालाश के लिए यहाँ से वहाँ भटकता रहता है, पर
हर जगह है, वही, नश्ल्वाद, जातिवाद, धर्म और क्षेत्रीयता। व्यक्ति इसी में
सिमटा हुआ है, उसे मंज़िल मिले भी तो कैसे?
निर्मल वर्मा शब्दों के साथ प्रतिकों के जादूगर हैं, उनकी तनहाई उन्हे इतना झकझोड़े हुये है, कि उन्हें व्यक्तियों की आवाज़ नहीं सुनाई देती है, वह
सुनते हैं “उस निरभेद्य मौन को, जो सारे घर में छाया है, जिसके भीतर ये आवाज़ें पराई, अपरिचित, भयावह-सी जान पड़ती है।”
यह डर है व्यक्ति का , जो
कहीं नहीं है, और हर जगह विद्यमान है,
वह उतना ही भीतर है जितना की बाहर, उससे बचा नहीं जा सकता
है। डर तो हर क्षण व्यक्ति को घेरे हुये है, उस घेरे को आज
के व्यक्ति ने इतना आत्मसात कर लिया है, कि वह छत पर हवा से
फड़फड़ाती चादरों और बरसाती के कोने से सटी एक छाया चाँदनी को डोलते हुये देख कर भी डर
जाता है।
निर्मल वर्मा की तुलना अकसर फणीश्वर नाथ रेणु के साथ की जाती रही है, लेकिन मैं उन दोनों लेखकों की तुलना नहीं
कर सकता। मुझे लगता है, जिस ग्रामीण के टूटते परिवेश की बात
रेणु जी ने की है, निर्मल वर्मा जी उससे आगे की घटना का
वर्णन वह करते हैं, जब ग्रामीण संस्कृति समाप्त हो जाएगी, तो शहर में जीने वाला अकेला इंसान किस तरह से जी रहा होगा, उसके सामने किस प्रकार की कठिनाइयाँ आएंगी, इसका ब्यौरा
वह खींचते हैं।
कुल मिलकर निर्मल वर्मा के द्वारा लिखी गई कहानी व्यक्ति का व्यक्ति के रूप
में पहचान है, जो कि
अज्ञेय से इस मायने में अलग है कि अज्ञेय का व्यक्ति,
व्यक्ति होने के बाबजूद भी समाज में ही जीता है, जबकि निर्मल
का इंसान खुद के लिए खुद की ही तालाश करता है।
नोट :- ये विचार निर्मल वर्मा की कहानी संग्रह जलती झाड़ी पर आधारित है।