मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

कहानी क्यों ज़रूरी है कक्षा में।

कहानी मजबूर करती है बच्चों को शिक्षक के करीब आने के लिए

फिर से कहूँगा, आजकल एक ही है जो दीमाग में नाचता रहता है स्कूल जाते वक्त। बात बहुत पुरानी है यही कुछ स्वतन्त्रता से पूर्व की। एक इंसान था जिसे हम गिजु भाई के नाम से जानते हैं। वह शिक्षकों से कहते हैं- “लीजिये, ये हैं बाल-कथाएँ। आप बच्चों को इन्हें सुनाइए। बच्चे इनको खुशी-खुशी और बार-बार सुनेंगे। आप इन्हें रसीले ढंग से कहिए, कहानी सुनाने के लहजे से कहिए। कहानी ऐसी चुनें, जो बच्चों की उम्र से मेल खाती हो। भैया मेरे, एक काम आप कभी न करना। ये कहानियाँ आप बच्चों को रटाना नहीं। बल्कि, पहले आप खुद अनुभव करें कि ये कहानियाँ जादू की छड़ी-सी हैं।
यदि आपको बच्चों के साथ प्यार का रिश्ता जोड़ना है तो उसकी नींव कहानी से डालें। यदि आपको बच्चों का प्यार पाना है तो कहानी भी एक जरिया है। पंडित बन कर कभी कभी कहानी नहीं सुनना। कील की तरह बोध ठोकने की कोशिश नहीं करना। कभी थोपना भी नहीं। यही तो बहती गंगा है। इसमें पहले आप डुबकी लगाएँ, फिर बच्चों को भी नहलाएँ।”
बच्चों के भीतर असंख्य जिज्ञासाएँ हैं। लेकिन उनकी जिज्ञासा जीवन के बोझ तले इतना दब गया है कि वह उसे बाहर निकालने की कोशिश भी नहीं करते। करें भी तो क्यों? आखिर उससे किसी को क्या फर्क पड़ता है? कौन पूछता है उनके प्रश्न को? कौन जानना चाहता है उनके दिल की बात को? वह तो गीली माटी की तरह है जिसे लोग आकार देने में लगे रहते हैं। किसी ने सोचा ही नहीं कि वह माटी का मूरत नहीं एक भरा-पूरा इंसान है और इसके भीतर भी असंख्य समवेदनाएं हैं, जो समय-समय पर बलबत्ती होती है और पहाड़ जैसी दुनिया से टकड़ा उनके भीतर ही दफन हो जाती है इसलिए स्कूल आते हों बस क्योंकि उन्हें आना था, क्योंकि उन्हें भेज दिया गया है, क्योंकि सरकार ने विद्यालय खोला हुआ है, क्योंकि वहाँ शिक्षक हैं, क्योंकि वहाँ मध्याहन भोजन मिलता है, क्योंकि वहाँ छात्रवृति मिलती हैं, क्योंकि वहाँ पढ़ाई होती है। क्योंकि वहाँ से जब वह निकलेंगे तो उसे समाज में सम्मान मिलेगा।
पर वह बच्चा जो स्कूल आया था पहली बार कई सवालों को लेकर, गुलाब का फूल लाल ही क्यों होता है? तितली उड़ती क्यों है? बादल बरशता क्यों है? पत्तियाँ हरी क्यों होती है? किसी को फर्क ही नहीं पड़ता। फर्क नहीं करता किसी को कि भगवान ने बच्चे को मुह दिया है तो बोलने के लिए, लेकिन उससी मुह पर उंगली रख कर उसे शांत कर दिया जाता हैं। उन्हे कान दिया गया है तो सुनने के लिए, लेकिन कान ऐंठ कर उन्हें सुनने से ही बेदखल कर दिया जाता है। वह अपनी आँखों से जो कुछ देखते हैं, कानों से जो कुछ सुनते हैं, उसे मुह से बोल नहीं सकते केवल कागज और कलम से लिख सकते हैं। लेकिन आजकल तो लेखन पर भी इतना हमला हो चुका है कि बच्चे लिखने के नाम पर दस बहाने बनाते हैं, डरते हैं, हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि लिखने में थोड़ी गलती भी हुई कि उसके खानदान के 7 पुसतों को ले आया जाएगा, जब वह पढ़ नहीं सके तो तुम क्या पढ़ोगे? जब हम सभी जानते हैं, पढ़ाई कोई बीमारी नहीं है जो वंशानुगत हो, यह कोई संक्रामक भी नहीं जो एक व्यक्ति से दूसरे में फेल जाये। यह तो अभ्यास है, यह अनुभव है, जिसका क्षितिज जितना बड़ा वह उतना बड़ा जानकार है।  
इसलिए कक्षा शिक्षण में जो तीन महत्वपूर्ण बाते हैं (जो मैं समझता हूँ) वह इस प्रकार है –
शिक्षा में कर्म को महत्व देना
कक्षा शिक्षण आसान नहीं है। खासकर आजके समय में आप सीधे कक्षा में जाकर भाषण देना प्रारम्भ नहीं कर सकते हैं नहीं किसी बच्चे को रटने पर मजबूर कर सकते हैं नहीं उसे डरा-धमका कर पढ़ाया जा सकता है। पढ़ाई का स्वरूप भी व्यक्ति के भोजन के जैसा है, भोजन कितना भी स्वादिष्ट क्यों न हो व्यक्ति उसे खाने के लिए तभी प्रेरित होता है जब उसे भूख लगी हो बिना भूख के खाना खुद पर अत्याचार करने जैसा है। वह भोजन उसके लिए ज़हर भी हो सकता है जो जीवन दायनी है। पढ़ना-लिखना भी उसी प्रकार के बच्चे के भूख से जुड़ा हुआ, उसे वर्तमान पृदृश्य में किस प्रकार से पढ़ाई-लिखाई मदद करेगी वह उसके लिए लालायित रहता है। परंतु विद्यालय में जो पढ़ाया-लिखाया जाता है वह पूर्णतः उसके परिवेश से कटा हुआ होता है। बच्चों के उस ज्ञान से कोई लाभ लिया ही नहीं जाता जो वह जानते हैं, जो वह अपने घर, अपने परिवेश से लेकर आए हुये हैं। आखिर शिक्षा तो इसी लिए है कि वह प्रकृति एवं परिवेश से ताल-मेल मिलाकर चलें।
परंतु हमारी शिक्षा वयवस्था ऐसी होगी है जिसमें न तो प्रकृति के लिए कोई सम्मान है नहीं परिवेश के लिए जगह। स्वार्थ एवं अहं का इतना बोल-बाला है कि जीवन समाज से हटकर व्यक्तिनिष्ठ होने लगा है। बच्चे अपराधी बनने लगे हैं और हम या तो अपराधी बना रहे हैं या तमाशबीन। इन दोनों के बीच में जो प्रतिकार करने वाला हो वह मानवीय सभ्यता तो विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है।
ऐसे में एक बड़ी चुनौती खड़ी है भारतीय शिक्षा पद्धति एवं शिक्षकों के बीच में कि वह कौन सी शिक्षा को लेकर चले। एक शिक्षा वह जिसमें सभी चाहते हैं कि वह रोजगारपरक हो, दूसरी कि उसमें मानवीय मूल्य भी निहित हो। शिक्षा का पहला रूप हर जगह हावी है जिसके परिणाम स्वरूप शिक्षा के दूसरे पहलू को नज़रअंदाज़ किया गया है। यहाँ प्रश उठता है कि शिक्षा को बाज़ार के हवाले कर हम जीवन के किस ढंग को जीना चाहते हैं साथ ही उस ढंग में मानव का भविष्य क्या होगा? यहीं से कहानी शुरू होती है शिक्षकों की भूमिका का शिक्षा में कि वह पहले जाने कि उनका दायित्व क्या है?
शिक्षा का सीधा अर्थ है व्यक्ति को समर्थ बनाना जिसमें वह स्वयं, समाज एवं देश के लिए निर्णय ले सके। जो व्यक्ति निर्णय लेने में ही समर्थ नहीं है उसका खुद का भविष्य कैसा होगा? अथाह पैसा हों व्यक्ति के व्यक्तित्व को निर्धारित नहीं करता है, बल्कि उस पैसों का वितरण किस प्रकार से हो यह निंधरित करना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए इसलिए शिक्षा को एक सीढ़ी की तरह देखना होगा, जिसमें पहला कदम उतना ही मजबूती से रखना होगा, जितना की आखरी। ऐसे में सभी शिक्षकों को धैर्य के साथ कार्य करना होगा। उन्हें यह बात जानना होगा कि वह पहले दिन ही पढ़ा कर किसी को कामयाब नहीं बना सकते हैं क्योंकि शब्द कामयाबी को भी जानना स्वाभाविक है। जिसके पास काम है, जो काम में व्यस्त है वही कामयाब है। चाहे वह कार्य किसी भी प्रकार का क्यों न हो। एक सुरक्षा में लगा गार्ड, हो या कचड़ा उठाने वाला इंसान हो या कोई बड़ा उद्योगपति जब सबके कार्य को समानता की दृष्टि से दह जाए। उस कार्य को करने वाला इंसान आत्मस्वाभिमान के साथ कैसे जिये जबतक हम इस बात की शिक्षा नहीं देंगे हमारी शिक्षा पद्धति अधूरी ही मानी जाएगी।
शिक्षा से नई दृष्टि का विकास हो
अब हम बात करते हैं वयवसाय की। निसंदेह शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो व्यक्ति को जीने के लिए, अपने सपने को प्राप्त करने के लिए, अपने उम्मीदों पर खड़े उतरने के लिए सार्थक हो। लेकिन शिक्षा ही उस व्यवसाय को मर्यादित करेगी जिसमें व्यक्ति निरंकुश न हो जाये। किस भी अस्पताल में बैठा डॉ॰ हो या विभिन्न कार्य में लगा हुआ अभियंता या शैक्षिक कार्य में लगा हुआ शिक्षक। एक विधिवत पढ़ाई के करके ये सबकुछ बना जा सकता है, लोग बन भी रहे हैं आगे भी बनते रहेंगे। लेकिन शिक्षा ही वह मजबूत कड़ी है जो निर्धारित करेगी कि इंसान, इंसान पहले है उसका पद बाद में है। हर व्यक्ति एक इंसान के रूप में सम्मानित है, उसका पद तो बस माध्यम है उसके जीवन-यापन के लिए। जब इंसानी महत्व की बात होगी तभी किसी अस्पताल में ईलाज़ कर रहा डॉ॰ अपनी जिम्मेदारियों को समझेगा और वह उसी तत्पर्यता के साथ एक गरीब का ईलाज़ करेगा जितनी तत्पर्यता से वह किसी पैसे वाल का ईलाज करेगा। वह डॉ॰ समझ सकेगा कि रोग की कोई औकात नहीं होती, क्योंकि उसने जो पढ़ाई पढ़ी है वह रोग से मुक्त समाज के निर्माण के लिए पढ़ा है, नाकि अपना बैंक बेलेन्स बढ़ाने के लिए। शिक्षा ही वह माध्यम है कि जब कोई अभियंता कुछ निर्माण करेगा तो यह ध्यान में रखेगा कि वह जो कुछ भी निर्माण कर रहा है वह मानवीय इतिहास में अमर रहेगा, उससे युग-युग तक लोगों का कल्याण होगा। उस निर्माण से उसका भी भविष्य लाभान्वित होगा।
आज बाज़ार ने लोगों एक विचार को संकुचित कर डाला है। वैचारिक रूप से लोग पंगु होते जा रहे हैं। अपना घर भर लेना जीवन की सार्थकता समझी जाने लगी है। स्वार्थ की इस चरमावस्था से कुछ भी शेष नहीं बचेगा। बहुत पहले किसी ने कहा था कि समाज व्यक्ति के लिए अनिवार्य है, समाज से बाहर या तो व्यक्ति रह सकता है या फिर राक्षस। ऐसे में अपने ही समाज से प्रतिस्पर्धा किस लिए है, क्या साबित करने के लिए है? ये कमी रह गई है शिक्ष व्यवस्था में शैक्षिक तंत्र में जो वह शिक्षा को समझ नहीं पाई है। यह कमी है हमारी जो हम उनलोगों को नज़रअंदाज़ करते रहे हैं, जो कार्य करते रहे। कर्म में लीन रहे। स्वार्थ से परे जाकर उस समाज के निर्माण में लगे रहे जिससे आने वाला भविष्य लाभान्वित हुआ।
याद करिए वह ज़माना जब सूर्य के छिपने के बाद संसार में राज हुआ करता था, चोरों का डाकुओं का, लूटेरों का, भूतों का डायनों का। भूत, प्रेत, डायन के डर ने मंदिर, मस्जिद और चर्च का निर्माण करवाया। अंधेरे के उस डर से मानवीय सभ्यता युगों-युगों तक शोषित होती रही। इस भाय के कारण एक वर्ग सभ्यता के चरम पर पहुँच गया तो दूसरा जीवन प्रयंत दलित होकर जीवन-यापन करने के लिए मजबूर हुआ। चंद मुट्ठी भर लोगों का पृथ्वी के सभी संसाधनों पर कब्जा हो गया अरु बहुसंख्यक लोग जो मेहनती थे, जो कर्म में लीन थे, जो दिन-रात एक करके कुछ करने में लगे हुये थे, वह और उनका भविष्य मूलभूत सुख-सुविधाओं से वंचित रहे। उनके पास कोई रास्ता नहीं था क्योंकि धर्म ग्रंथ ऐसे बन रहे थे, जिसमें उनके लिए कोई स्थान नहीं था। सेवा करना केवल मेहनत कश लोगों की पहचान थी। लोग अपनी बुद्धि से नहीं चर्च, मंदिर, मस्जिद से नियंत्रित होते थे। उनमें ईश्वर, भगवान, खुदा का ऐसा खौफ भरा जाता था कि वह मान लेते थे, कि “उनकी गर्दन जिस पाँव के तले दबी है उसे सहलाने में ही भलाई है। उस समय लोगों का ज्ञान सीमित था, क्योंकि लोग एक ही जगह सिमटे हुये थे।
लेकिन जब उस अंधकार को चुनौती दी गई, एक चुटकी बजाते हुये जब हम रात को भी दिन-सा रोशनी में ढालने लगे तो लोगों की धारणा बदलने लगी। यह संभव हुआ उन महान लोगों के कारण जिसने दुनिया की पीड़ा को समझा। उसे आत्मसात किया और निकल पड़े विश्व का कल्याण करने के लिए। वैज्ञानिकों, आविष्कारकों, लेखकों, समाज सुधारकों का एक वर्ग खड़ा हुआ। उन्होने समाज में व्याप्त चुनौतियों को समझा ही नहीं जी-जान लगाकर उसके खिलाफ लड़ाइयाँ भी लड़ी, कुर्बान भी हुए, लेकिन उन्होने जो भविष्य दी, अंधेरे को चीरकर जो रोशनी दी उससे हम आज भी लाभान्वित हो रहे हैं।
शिक्षा आत्मविश्वास में सहायक हो
अतः शिक्षा का स्वरूप ऐसा हो जिसे पाकर दुनिया का हर व्यक्ति आत्मविश्वास से इतना भर जाये कि उस भीतर उस चेतना का विकास हो जिसके माध्यम से हो कह सके कि वह निर्माण करने आया, वह दुनिया को कुछ देने आया है। लेने वालों का कोई इतिहास नहीं होता, विश्व तो कृतज्ञ हुआ उसका जिसने केवल दिया ही दिया है। ढेरों ऐसी कहानियाँ हमारे बीच बिखरी परी है। आवश्यकता है तो उसे समेटने की। बाज़ार ने लोगों के भीतर निराशा, हताशा, अवकुंठा का ऐसा जहर भरा है कि हर इंसान को लगता है कि इस दुनिया में केवल लूटेरे, हत्यारे, बालात्कारी, शोषक, नीच, अधम, पतित किश्म के ही इंसान रहते हैं। वह जान ही नहीं रहे हैं, कि लोग केवल चोरी नहीं करता, केवल लूट नहीं रहा, केवल ठग नहीं रहा, केवल बालत्कार नहीं कर रहा, वह तो निर्माण भी कर रहा है। बड़ी-बड़ी बिल्डिंगे बन रही है, यातायात का जाल बिछ रहा है, लोगों का कहीं से भी कहीं जाना सुगम हो गया है, एक जगह बैठा हुआ इंसान दुनिया के किसी कोने में बैठे किसी दूसरे इंसान के साथ बातचीत कर सकता है।
संसार से डरा हुआ इंसान संसार का असली चेहरा  नहीं देख पा रहा है। वह इतना डरा हुआ है कि हर कोई एक दूसरे से अविश्वास करता है। इस अविश्वास ने दो लोगों के बीच में ऐसी घरी खाई खोद डाली है कि मानवीय समाज एक दूसरे के करीब आने के बजाय और दूर होती जा रही है। इस निराशा ने एक देश के ही लोगों को इतना दूर कर दिया  है कि एक ही सभ्यता-संस्कृति के लोग एक दूसरे को शंका की दृष्टि से देखते हैं। विश्व भातृत्व की कल्पना कैसे साकार हो। आज दुनिया बारूद के ढेर पर सवार है, जिसे बिस्फोट कर उड़ाने के लिए एक मचिश की तिल्ली ही काफी है।
ऐसे में ही शिक्षा ही वह साधन है जो मानवता की ऐसी घनघोर वारिस कर दे जिससे दुनिया का सारा बारूद मिट्टी के ढेर में बादल जाए और ढेर पर उग आए वनस्पति जिससे लोगों को मिले प्राणपद वायु जिसमें मानवता का भविष्य साफ हवा में अपना जीवन-यापन कर सकें।
मानवता की इस नवीन धारणा का शिक्षण होगा कहानी से
अब लौटता हूँ अपनी भूमिका और जिसमें मैंने इंगित किया था गिजु भाई के कथन को। निसंदेह मानवीय समाज की सुंदर कल्पना के लिए शिक्षा का ही सशक्त माध्यम है और वह है कहानी।  समाज में व्याप्त कहानियों के लेकर जब शिक्षक अपने बच्चों के पास जाएगा, तो शिक्षा का आधा कार्य वह कर देगा। कहानी जिसमें निर्माण की गाथा हो, कहानी जिसमें उत्साह हो, कहानी जो बच्चों को आत्मविश्वास से भर दे। कहानी वह नहीं, जो व्यक्ति अपनी अवकुंठा से रचकर सुना रहा हो।
कहानी साधारण नहीं होती, उसमें मुश्किल क्षण आएंगे लेकिन ऐसा नहीं कि उस मुश्किलों से निकला नहीं जा सकता है। कहानी मुश्किलों का ताना-बाना हो, लेकिन तमाम संघर्षों के बाद जीवन में जो सफलता मिलती है उस सुखदाइ परस्थिति से भी कहानी रूबरू करवाए तभी वह कुशल कहानी होगी जो एक नए युग का संचार करेगी।
कहानी सुनाने का मेरा व्यक्तिगत अनुभव
मैं अक्सर विद्यालयों में जाता हूँ। कई जगह तो वहाँ जाता हूँ, जहां बच्चों से पहली बार मिल रहा होता हूँ। उस वक्त उन बच्चों को कहानी सुनाता हूँ। जैसे कक्षा में शेर बाबा’, अगर-मगर’, चबर-चबर’, जो भी करो सोच-समझकर करो। इत्यादि। इन कहानियों को सुनाने के बाद एक जो बदलाव देखता हूँ, बच्चे जो पहली बार मिलने के कारण मुझसे हिचकते रहते हैं, वह  मेरे करीब आने की कोशिश करने लगते हैं। वह मेरा हाथ पकड़ते हैं। वैसे नहीं जैसे किसी का कथन होता है कि वह शिर पर बैठने आ जाते हैं। वह मुझसे बातचीत करते हैं। वह कहानी न भी सुनाएँ, फिर भी बतलाते हैं कि उनके घर में कितनी बकरियाँ हैं, वह उन्हें चुगाने कहाँ-कहाँ ले जाते हैं, उनकी छानिया कहाँ है, वहाँ जाते-जाते रास्ते में क्या-क्या करते हैं। उनमें से कितनों ने रास्ते में जंगली-जानवरों को देखा है, उससे कैसे बचे हैं? जब वह जानवर के नजदीक थे तो वह क्या सोच रहे थे।?
कैसे एक बच्चे के घर में साँप घुस गया  था और उसने पत्थर उठाकर उसे मार डाला था। साँप पर फिर लंबी कहानी, किस-किस ने कहाँ-कहाँ साँप देखा था। क्या सभी साँप जहरीले होते हैं। सांप को मारना चाहिए या नहीं। व्यक्ति का जीवन इतना महत्वपूर्ण क्यों है कि वह किसी भी जानवर को मारने के लिए उतारू हो जाता है। (मैं निष्कर्ष नहीं देता, बच्चे खुद बतलाते हैं, यदि साँप को नहीं मारा, तो रात को वह किसी को भी काट सकता है, किसी अपने की बड़ी हानि होने से अच्छा है जो उस साँप को मार दिया जाए।)
कहानी शुरू होने से एक नए संबंध का सूत्रपात होता है मेरे और विद्यालय के छात्रों के बीच। कहानी सुनकर बच्चे जब घर जाते हैं, तो जो छात्र उस दिन विद्यालय नहीं आए होते हैं, उन्हे भी वह उसी कहानी को सुनाते हैं, जिसे मैंने स्कूल में सुनाया था। अगले दिन जब कभी दुबारा जाता हूँ, तो स्कूल न आने वाला बच्चा भी कहानी सुनाने की गुजारिश करता है।
उच्च प्राथमिक विद्यालय में कहानी का स्वरूप बादल देता हूँ
उच्च प्राथमिक विद्यालय में वह कनही सुनाता हूँ, जो मनोरंजक होने के साथ-साथ बच्चों को थोड़ा सा सोचने-समझने के लिए मजबूर करे। जैसे कलपना चावला गौतम बुद्ध आइन्स्टाइन महात्मा गांधी की कहानी। जिससे बच्चे अपने इतिहास वैज्ञानिकों को भी जान सकें, समझ सकें।
इसमें कहानी का स्वरूप उनकी जीवनी नहीं होती है, उनके  जीवन की कोई एक महत्वपूर्ण घटना को लेकर निर्मित किया गया होता है, जैसे गांधी जी का नमक आंदोलन, जिसके माध्यम से नमक के महत्व से लेकर उसके बनने तक के बारे में विस्तार से चर्चा होती  है, गुलामी पर बातचीत होती  है।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है, पढ़ाई को रुचिकर और शिक्षा को मानवीय मूल्यों से जोड़ने में कहानी एक सर्वोत्म माध्यम के रूप में प्रयुक्त की जा सकती है। कहानी में पूरी स्वतन्त्रता होती है कि बच्चे कुछ भी प्रश्न पूछे, उन्हें प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। शिक्षा का भी यही उद्देश्य से है कि बच्चे जितना प्रश्न पुछेंगे शैक्षिक कार्य उतने ही कुशलता से संपादित किया जा सकता है। वह शिक्षण निष्क्रिय शिक्षण माना जाएगा जिसमें छात्र कोई प्रश्न ही नहीं पूछ रहे हैं।
छात्र प्रश्न नहीं पूछ रहें मतलब जो कुछ पढ़ाया जा रहा है उसे वह अपनी ज़िंदगी से नहीं जोड़ पा रहे हैं। शुरुआती दौर में प्रश्न छात्र न भी पूछे फिर भी उनके भीतर जिज्ञासा का संचार करना पड़ता है। कि कहानी में अमुक घटना कैसे हुई थी, एक जगह कहानी सुनते वक्त एक बच्चा ने मुझसे प्रश्न किया था कि –“क्या जानवर भी मनुष्य की तरह बोल सकता है”। ऐसे प्रश्न की कल्पना मैंने नहीं की थी, इसलिए बच्चों के बीच ही उस प्रश्न को भेज दिया, तो बच्चों में से ही कई प्रकार की प्रतिक्रिया आने लगी। एक बच्चे ने तो यहाँ तक कहा कि हो सकता है, नीरू शेरो की भाषा जानती हो।
खैर कहानी सुनाकर मज़ा आता है, खासकर तब और जा  मेरी कहानी सुनने के बाद  बच्चे भी अपनी कहानी सुनाने के लिए प्रेरित होते हैं। हालांकि ये कम ही जगहों पर होता है जहां बच्चे खुद ही कहानी सुनाने के लिए प्रेरित हो, बाकी जगह अभी मुझे उन्हें बार-बार प्रोत्साहित करना पड़ता है।
लंबे समय तक जिन्हे बोलने न दिया गया हो वह इतनी जल्दी अपनी प्रतिक्रिया देंगे भी तो कैसे? लेकिन मेरा संघर्ष तो बदस्तूर जारी है।

(नोट- ये लेखक के 26 विद्यालयों के अनुभव के आधार पर है। इससे संबन्धित किसी भी प्रकार के विवाद लिए अज़ीम प्रेमजी फ़ाउंडेशन उत्तरकाशी में जाया जा सकता है। )
जितेंद्र कुमार झा

भारतीय भाषा विभाग, ए॰पी॰एफ, उत्तरकाशी 

बुधवार, 22 जून 2016

jangal jahan se shuru hota hai.

जंगल जहां शुरू होता है (संजीव)
एक जीवन, एक सफर, एक उमंग। यह सब चाहिए पर किसके लिए? क्यों? जंगल का कोई नियम नहीं है, वहाँ जो जितना बड़ा शिकारी है वही वहाँ का राजा है, इसीलिए शेर को जंगल का राजा कहा गया। यही जंगल जब व्यक्ति के जीवन में उभरता है तो क्या दृश्य प्रकट होता है इसका ताना-बना बुना है “संजीव” ने अपने उपन्यास “जंगल जहां शुरू होता है” में।

कोई नायक नहीं, कोई खलनायक नहीं, बस व्यवस्था एक जंगल है, जो व्यक्ति को शक्ति केन्द्रित होने के लिए मजबूर करता है। जी हाँ मजबूर करता है, प्रोत्साहित नहीं। जीवन तो बड़े ही साधारण ढंग से चलता है, खाने के लिए खाना चाहिए, रहने के लिए घर, खुशी के लिए परिवार और उत्सव मनाने के लिए समाज। पर जंगल का राज तो कहता है, मेरे पास शक्ति है, सामर्थ्य है मैं तो पूरा का पूरा लेकर ही रहूँगा। इस पूरे के लिए शुरू होता है शोषण का खेल। एक प्रथा बनती है, शिकारियों और शिकार की। जो कमजोर है, जो लाचार है, जो बेबस है वह शिकार, जिसके पास क्षमता है, जिसमें दुसाहस है, जिसमें कठोरता है, निर्दयता है वह शिकारी।

बिहार के बेतिया जिसे पश्चमी चंपारण के नाम से भी जाना जाता है, वहाँ के थारु जनजाति के आधार पर उपन्यास का कथानक बुना गया है। पर वह बस कथानक का एक अंग है। पूरी की पूरी घटना तो जंगल का वर्णन में ही बिता है। जंगल खूबसूरत नहीं होता, वह प्रकृति के खाद्य शृंखला के लिए सुंदर और बेहतरीन तो हो सकता है लेकिन उसके नियम बड़े ही कठोर होते हैं।

जंगल का नियम है हिंसा और प्रतिहिंसा का। उपन्यास में डाकुओं के नियंत्रण उसके खात्मे के लिए कुछ पुलिस अधिकारी नियुक्त किए जाते हैं उन्ही में से एक है कुमार। वह नायक नहीं है बस एक पुलिस अधिकारी है। वह डाकुओं को पकड़ना चाहता है, इनाम पाना चाहता है, तरक्की पाना चाहता है और जब किसी चाहत को ध्यान में रखकर कोई कार्य करता है तो वह किसी भी हद तक जा सकता है। वह प्रेम के धोखे में किसी से बलात्कार कर सकता है, किसी से दो बाते मीठी करके उसके राज को जान सकता है। राज को जानने के बाद उसे मौत के घाट उतार सकता है।

उपन्यास लोकतन्त्र का खुला मज़ाक करते हुये हमारी व्यवस्था को उकेर कर रख देता है। उपन्यास में डाकू हैं, पर ये डाकू हैं कौन, वही जो कभी जमींदारों के लठैत हुआ करते थे, जिन पर किसी का नियंत्रण नहीं था, जो कभी भी किसी गरीब जनजाति की ज़मीन हड़प सकते थे, जो कभी भी किसी दलित की बहू-बेटियों की आबरू से खेल सकते थे। जब उन्होने देखा कि ये सब करना कितना आसान है, तो क्यों न अपना दल बनाया जाए, लोगों को लूटा जाए, लोगों की बहू-बेटियों को रखेल बनाया जाए। ऐसे ही बनता जाता है वहाँ एक नया दल। जिसका काम है, अपहरण, लूट, बलात्कार, हत्या, चुनाव में बूथ लूट कर नेताओं की मदद करना।

ऐसे जंगल में कुछ कमजोर जानवर भी रहते हैं, उसी प्रकार का एक परिवार है काली का। उसके परिवार में एक बड़ा भाई है बिसराम, भाभी है, दो भतीजी, जिसमें से एक की साँप के काटने से मृत्यु हो जाती है। परिवार के पास खेती भी थी, पर जमींदारों ने हड़प ली, मामला कोर्ट में है पर कोर्ट किसका, मैंने पहले ही कहा जंगल में जो बड़ा शिकारी, शिकार उसका।

काली कोर्ट कचहरी के चक्कर में परेशान है, बिसराम जमींदार की चिरोरी करने में और उसकी भाभी को पुलिस वाले उठाकर ले जाते हैं कि वह डाकुओं के लिए खाना बनाती है। घर आकार बिसराम पूरी रात परेशान है, बच्ची घर में, उसे कैसे दूध पिलाये, वह आती क्यों नहीं। बच्ची का रोना उससे बरदास्त नहीं होता है, तो वह थारुओं के लिए वर्जित गाय के दूध को बच्ची के मुह में डाल देता है।

सवेरे होते ही दिखाई देती है, लस्त-पस्त बिसराम की बहू आते हुये। एक गरीब जिसका कि ज़मीन जमींदारों ने छीन लिया, डाकू ज़िंदगी छिनने पर आमदा है, और आज पुलिस वालों ने इज्ज़त भी लूट ली। फिर भी जो हुआ सो हुआ, काली डाकुओं के राह पर नहीं जाना चाहता है। वह मेहनत-मजदूरी करना चाहता है। पर मजदूरों को लूटता है ठेकेदार। वह बेगार भी करता है, पर उसे वहाँ से कहीं और भेजा जाता है, वहाँ देखता है, कि उसके साथी नौकर फेंकन की पत्नी का बलात्कार, उसकी मलकाइन खुद करवाती है। उसका मन विद्रोह से भर जाता है और अपने पुराने मित्र नारायण के साथ मिलकर वह भी जंगल के नियमों का शिकार हो जाता है। बन जाता है डाकू। व्यवस्था से हारा हुआ लूटेरा, जीवन से धोखा खाया हुआ शिकारी, नियमों को ताक पर रखने वाल विद्रोही। उसके डाकू बनने की सज़ा मिलती है उसके  पूरे परिवार को।

उपन्यास में सब हैं, लोग है, समाज है, संस्कृति है, देवता हैं, पुलिस है, नेता हैं, सरकार है। पर सब किसलिए। सिर्फ और सिर्फ शोषण करने के लिए। किसी के पास कोई योजना ही नहीं है। सरकार डाकुओं को मारना चाहती है, पर नेता का तो दोस्त है डाकू, वही तो उन्हें वोट के समय मदद करते हैं, सरकार चाहती है जमींदारी प्रथा से निजात, पर यही जमींदार तो नेताओं को पैसा देते हैं चुनाव लड़ने के लिए और सरकार यही नेता तो हैं। अर्थात व्यवस्था जस की तस बनी रहनी चाहिए।
एक पुलिस वाला करेगा भी तो कितना, हर पुलिस की एक जाति है, हर जाति का एक पुलिस है, ऐसे ही डाकू और नेताओं का भी हाल है, हर जाति का एक डाकू, हर डाकू की एक जाति।

संजीव कथा कहते नहीं हैं, वह घटना की ओर इंगित मात्र करते हैं, जो उनकी शैली को लाजवाब बना देती है। उपन्यास पढ़ते वक्त आप एक नायक को ढूँढने की कोशिश करेंगे, पर वह नहीं मिलेगा, कहीं भी नहीं, किसी भी पात्र में नहीं। यदि नायक आप पुराने उपन्यास से ढूंढ कर लाएँगे, तो देखेंगे कि नायकत्व की प्राप्ति के चक्कर में बिसराम का क्या हाल होता है। ज़माना कृष्ण का नहीं है कि अपनी गलतियों को स्वीकारने वाला हो गया नायक से महानायक।
होता होगा किसी सभ्यता में यह सब। यहाँ तो बस नियम चलता है जंगल का। तुमने एक गलती की नहीं कि हो गए ढेर।

उपन्यास में सब है, पर क्यों? लगता है जैसे एक बोझिल, बेकार, लाचार सी ज़िंदगी को जीने के लिए। इस बोझिल ज़िंदगी को सहजता से जीने के लिए चाहिए सत्ता। आज सत्ता नेताओं के हाथ में है। आपको जीना है, शान से जीना है, अपने आत्म्स्वभिमान के साथ जीना है, तो बनिए नेता। फिर पुलिस भी आपकी, डाकू भी आपका।

हर पाँच साल के बाद आने वाला चुनाव भारतीय लोकतन्त्र की रक्षा के लिए नहीं होता है, वह होता है उन डाकुओं के लिए, जो अब कुछ लोगों को लूटते-लूटते इतने थक चुके हैं कि वह कुछ बड़े स्तर पर लूटना चाहते हैं, राजनीति के लिए उनका अनुभव भी काम आता है। इसी प्रकार से उपन्यास का एक पात्र डाकू परुश्राम चुनाव जीत कर एम॰एल॰ए बन जाता है। उसके विरोधियों को मार दिया जाता है। जंगल अभियान समाप्त होता है। कुमार वापस चले जाते हैं।

कुछ था ही नहीं कहीं उस थारु जनजाति के लिए जिससे वह एक दिन की भी सुखद ज़िंदगी जी सकें, बस था तो आतंक जिसके साये में उन्हे पलना था, जीना था। और वह जीना भी इसलिए कि डाकू, जमींदार, पुलिस, राजनेता वक्त, बेवक्त उनसे फायदा निकाल सके।

जंगल के भेड़ियों के लिए कुछ कमजोर जानवर भी तो होने चाहिए, जिनपर वह अपना हवश निकाल सकें।

यह उपन्यास अपने मानदंड पर पूरी तरह से खड़ा है। इसमें न कोई मनोवैज्ञानिक चेनता है, न कोई सामाजिक आदर्शवाद, नीरा अकेलापन तो आप ढूंढ ही नहीं पाएंगे, है तो बस जीवन जीने की उत्कंठा, पीड़ा, आवाज़ उस थारु जनजाति की।

पर भाई ये जंगल है, यहाँ तो सिर्फ शेर की दहाड़ सुनाई देती है। 

रविवार, 15 मई 2016

रेखा चमोली की किताब "स्त्री बनी पेड़" की समीक्षा

कविता के नए प्रतिमान के साथ खड़ा है “पेड़ बनी स्त्री”
कविता क्या है? भारतीय काव्य-शास्त्र की संस्कृत परंपरा से लेकर वर्तमान में नामवर सिंह तक कविता में खास कर उसकी अभिवयक्ति के तरीके में बहुत अंतर आचूका है। कविता अर्थात “सबसे दुखी क्षण की वाणी मात्र नहीं है” कविता व्यक्ति के साधारण अनुभवों की भी अभिवयक्ति हो सकती है। समाज से  व्यक्ति इस कदर गूँथा हुआ है कि दोनों को एक-दूसरे के बिना देखना संभव नहीं है। कविता भावों का चरमोत्कर्ष हो सकता है। लेकिन भाव सिर्फ और सिर्फ कवि के नहीं होंगे, श्रेष्ठ कविता वही होगी जिससे पाठक भी कवि के भावों के साथ एकाकार स्थापित कर लेगा। अनुभूति की अभिवयक्ति का साधारणीकरण ही बेहतरीन रचना की निशानी है।
संस्कृत या जिसे हिन्दी काव्य-शास्त्र भी कहा गया है, वहाँ से लेकर अबतक कविता के स्वरूप में विशाल परिवर्तन आ गया है। लेखक और पाठक के जीवन का अनुभव तीक्ष्ण-सूक्षम एवं वृहत हुआ है। कविता एवं उदात्त तत्व का परिप्रेक्ष्य केवल सामाजिक निष्ठा नहीं रही है, एक व्यक्ति का स्वयम के लिए दिया गया समय भी है। अपने को जानना, खुद को जानकर दूसरे के समक्ष अपने को अभिवयक्त करना समसामयिक कविता का मूल स्वर है। अपने को जानना भी एकांतिक सुख का कारण नहीं है। व्यक्ति खुद को जान भी रहा है तो सामाजिक परिप्रेक्ष्य में ही। कि उस विशाल परिदृश्य में मेरी क्या पहचान है?
“पेड़ बनी स्त्री” नमक काव्य संग्रह कुछ इन्हीं उलझनों के साथ उपस्थित होती है। उलझन से तात्पर्य कथ्य का उलझन नहीं है, उलझन है परिवेश का, उलझन है सामाजिक ताने-बाने का। जिसमें हम-आप सभी रहते हैं। “पेड़ बनी स्त्री” शीर्षक के रूप में ही चौंकाती है। आखिर स्त्री पहले क्या थी? जो अब पेड़ बन गई। स्त्री के पेड़ बनने तक की एक विशाल यात्रा हिन्दी काव्य-परंपरा में दिख जाता है। जहां आदिकाल में मात्र वह उपभोग और विलास की वस्तु थी, मध्यकाल में स्त्री के स्वरूप में विविधता थी, कहीं प्रेयसी थी तो कहीं विलास की वस्तु के रूप में व्याख्यायित होती रही। छायावाद की स्त्री अति सम्मान की पात्र बनी, प्रगतिवाद  शोषक-शोषण का केंद्र बना रहा। आधुनिक समय में जब स्त्री स्वतन्त्रता की बात उठी तो लोगों ने समानता और समान व्यवहार को नहीं समझा उन्होने सोचा पुरुष की तरह स्त्री के साथ व्यवहार करने से उनकी स्थिति में सुधार आ जाएगा। इस परस्थिति ने स्त्री को पेड़ सा बना दिया। वह ठूंठ भी हो सकता है तब भी जलावन के काम आ ही जाएगा, हरा-भरा रहे तो फल, हवा, पानी, दवा, छाया सबकुछ मिल सकता है। अर्थात जिस आर्थिक विकास के कारण स्त्रियों की स्वतन्त्रता की बात की जा रही है, उसमें वह आदिकाल से लेकर अबतक मात्र उपभोग की वस्तु से बढ़कर लाभदायक उपभोग की वस्तु बन गई है।
इस काव्य संग्रह में इसी पीड़ा की  व्याख्या है। पीड़ा पुरुष से तुलना करने की नहीं, किसी से ज्यादा स्वयम को श्रेष्ठ घोषित करने की नहीं। पीड़ा स्त्री के रूप में स्त्री को सम्मान दिलाने की। सामाजिक दायरे में बंधी स्त्री से अपेक्षा की जाती है कि वह सभ्य बेटी बनी रहे, शुशील बहू बनी रहे, आज्ञाकारी पत्नी बनी रहे। यह दायरा इतना घनिष्ठ एवं संकुचित है जिसमें उनका दम घूंटता है। वह जानती है जो उसके अपने हैं, वही उसकी राह में कांटे बने हुये हैं, ऐसे भ्रामक स्नेह से बचने के लिए कवयित्रि कहती हैं
           दुनिया भर की स्त्रियों तुम जरूर करना प्रेम
            पर ऐसा नहीं कि जिससे प्रेम करना उसी में ढूँढने लगना
            आकाश, मिट्टी, हवा, पानी, ताप।”
ऐसा भी नहीं है कि सामाजिक दायरे ने स्त्री की प्रतिभा को रोक दिया हो। चाहें कितनी भी लकीरें समाज में खींची हों, जो भी नियम-कानून बनाए गए हों, उसे तोड़कर खेल के मैदान से लेकर सपनों की उड़ान तक स्त्रियाँ पहुँच ही जाती है। कौन भूल सकता है, कल्पना चावला, पी॰टी॰ऊषा सरीखी महिलाओं को। इनकी गाथा का वर्णन करते हुये मुक्ति नामक शीर्षक कविता में कवयित्री लिखती हैं-
                    “लकीरें एक के बाद एक, फिर भी छूट ही जाता है
                     कोई न कोई बिन्दु, जहां से फूटती हैं राहें,
                     चमकती हैं किरणें
स्त्री जिस परिवेश में जीना शुरू करती है, उसका प्रारम्भ उसके बचपन से ही शुरू हो जाता है। सच कहा जाए, तो स्त्री का बचपन होता ही कहाँ है। वह तो उस ककड़ी की तरह रहती है जिसे देखकर हर किसी के जी में पानी आने लगता है। 12 वर्ष की हुई नहीं कि दुनिया समाज सब उसे ललचाई-तीखी नज़रों से देखना शुरू कर देते हैं। एक छोटी बच्ची को परिपक्व बनाने की शाज़िश में हर कोई लग जाता है। लगे भी क्यों नहीं स्त्री की उन्मुक्तता की वकालत कौन करेगा, डिब्बाबंद अर्थात तैयार माल। अर्थात स्त्री की सौम्यता, उसकी अनुगामी होने की प्रवृति, लोगों से लाज़-लज्जा करने की अदा, नज़रे झुका कर चलने का सलीका ही सभी को पसंद है। अपने लिए हर कोई ऐसी ही पत्नी और बहू चाहता है। तो फिर उनकी स्थिति का विरोध करे भी तो कोई क्यों करे?
इस काव्य संग्रह में द्वंद्व नहीं है, उन्मुक्तता का गान भी नहीं है। कविता है एक स्त्री के रूप में स्त्री को पहचानने की। स्त्री देवी भी नहीं है, स्त्री सिर्फ और सिर्फ शरीर भी नहीं है, स्त्री पेड़ भी नहीं है, तो वह क्या है? वह बेटी है, माँ है, बहन है। परंतु यह बारीक सी बात भी लोगों को समझाना आज के समाज में कठिन ही नहीं दुष्कर भी हो गया है। इस अवस्था की चरमोत्कर्ष तो “हत्या से ज्यादा” शीर्षक नामक कविता में होती है। एक बच्ची को, अपनी ही बेटी, बहन को एक सुरक्षित माहौल न देने की पीड़ा क्या होती है? इसे समझना एक उलझन भरा नहीं एक आत्मीय सवाल है। एक उन्मुक्त(मानसिक रूप से पीड़ित) लड़की दीपाली की स्वछंदता भी लोगों को बरदास्त नहीं होती है। दीपाली” शीर्षक नामक कविता एक लड़की के माध्यम से यह दर्शाने की कोशिश है कि किस प्रकार भेड़िये की खाल में हम इंसान बने बैठे हैं और रोज हादसे हमारे सामने से होकर गुजर जाते हैं। वह आत्मिक प्रेम, वह सांसारिक जीवन को जीने की कला क्यों पीछे छूटती जा रही है?
यहाँ यह बात ज़ोर देकर कहना चाहूँगा कि लेखिका का उद्देश्य यहाँ कहीं से भी स्त्रीवादी चेतना को समर्थन नहीं है, इसमें एक नजरिये की आत्मीयता है समाज के साथ। जो उनकी कविता “एक माँ के होते” में जहां कुत्सित मानवीय प्रवृति को दर्शाया गया है वहीं ब्रेक के बाद” में दलित चिंता उभरकर सामने आती है।   
इस प्रकार से इस पूरे काव्य संग्रह की कविता को तीन महत्वपूर्ण विषयों के अनतर्गत रखा जा सकता है, एक स्त्री को मात्र शरीर समझे जाने की संवेदना की कविता, दलित चेतना की कविता एवं प्रकृति चित्रण। वैसे प्रकृति चित्रण को दूसरे दलित ये पिछड़े लोगों की संवेदना के अंतर्गत रखा जा सकता है। परंतु लेखिका के प्राकृत चित्रण ने कविता में नए प्रतिमान को व्याख्यायित किया है। गंगा की पवित्रता के नाम पर अपवित्र करने की परंपरा का पुरजोर विरोध करती हुई वह लिखती हैं, -
                तुम चाहते हो मैं बनूँ गंगा की तरह पवित्र-----------
                डाल जाओ उसमे उसमें कूड़ा-करकट मल अवशिष्ट
                धो डालो अपने पाप।
इस काव्य संग्रह में संघर्ष है, स्वतंत्र पर ज़िम्मेदारी से बंधा हुआ संघर्ष। कवयित्री पूरे जोश-खरोश के साथ उस संघर्ष से लड़ने और जीने की वकालत करती हैं। जीवन यदि जंग है, तो शायद हार भी स्वाभाविक है पर वह खुले तौर पर आमंत्रित करते हुये हारे मन को उत्साह देते हुये कहती हैं
                     गर्व से खड़ा उपस्थित का भास दे रहा है ठूंठ
                     फिर से कोंपले फूटने लगी हैं, उसने हार नहीं मानी
                     और ढूंढ ली जीवन  की संभावनाएं
लेखिका जानती हैं कि दुनिया भेड़ियों से भरी-परी है, उसकी आतंकित आंखे आत्मा तक को छेदने के लिए तैयार है पर उनके स्वर में कहीं भी निराशा नहीं है अपने पहाड़ की औरतों के साहस विश्वास और दृढ़ निश्चय को प्रकट करती हुई कहती हैं –
               हमारे हाथों में थमाओ कलमें
               पकड़ाओ मशालें आओ हमारे साथ
               हम बनेंगी क्रांति की वाहक हमारी ओर दया से नहीं
               बराबरी और सम्मान से देखो।
“पेड़ बनी स्त्री” कविता संग्रह रेखा चमोली जी की पहली काव्य संग्रह है। पर रचना कौशल एवं अनुभूति के स्तर पर वह पूरी रूप से परिपक्व दिखती हैं। भाषाई कौशल खास कर प्रकृति से रंग चुराकर जिस प्रकार से उन्होने कविता में उस रंग के माध्यम से चित्रा उकेरा है वह अपने-आप में बेमिशाल है। सूरज को छुट्टी पर भेजना हो या लता तथा पेड़ के माध्यम से मानवीय संवेदना को दर्शाना ये कविता के प्रतिमान के रूप में नए से लगते हैं। कवयित्री स्वयम स्त्री है, इसलिए स्त्री जीवन से जुड़े अनुभव उनका भोगा हुआ यथार्थ तो है ही, एक मानवीय दृष्टि से भी उनकी अनुभूति की प्रामाणिकता घोषित होती है।
शिक्षा, लोकतन्त्र, विकसित देश का स्वप्न देखने वाले भारत में स्त्री, दलित और बच्चों की स्थिति क्या है? क्या इस ओर किसी का ध्यान जा रहा है? जो पुरुष समाज विलाशिता के केंद्र में जी रहा है वह विलाशी स्वरूप उसे अपने ही बहन-बेटियों को असुरक्षित बनाता जा रहा है।
इस कविता संग्रह की प्रत्येक कविता पढ़ने लायक है, जिसकी गहन अनुभूति आपको भीतर तक झकझोड़ डालेगी। यदि मानवीय संवेदना के साथ आप खड़े हैं, तो समझ सकेंगे कि कितना मुश्किल होता है सिर्फ और सिर्फ किसी के फायदे के लिए जीना।


बुधवार, 30 मार्च 2016

bhasha

अथाह सागर है भाषा और हम बूंद को लिए जीते हैं।
भाषा क्या है? आप किसी से भी पूछ लीजिये, जवाब एक ही मिलेगा, “वह माध्यम जिसके द्वारा हम अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।” अब इस परिभाषा पर गौर करें, तो आप पाएंगे, कि भाषा बिजली के स्वीच की तरह है, कि जब आप किसी के सामने जाते हैं, तो उसे ऑन कर देते हैं, और आप बोलने लगते हैं, फिर जैसे ही आपके सामने वाला बोलता है, तो आप स्वीच ऑफ कर लेते हैं, फिर दूसरा अपनी बात को समाप्त करता है और फिर आप स्वीच ऑन करके बोलना शुरू कर देते हैं।
क्या भाषा यही है? क्या भाषा उस समय नहीं होती, जब आप सड़क पर अकेले चल रहे होते हैं? क्या भाषा उस समय नहीं होती, जब आप अकेले बैठे होते हैं? क्या भाषा वहाँ भी नहीं होती, जब आप आँख मूँद कर सोये हुये होते हैं? क्या कोई भाषा विहीन दुनिया की कल्पना कर सकता है?
जी नहीं, हम भाषा के बिना इस दुनिया की कल्पना नहीं कर सकते हैं। भाषा हर जगह मौजूद है। हमारे सोचने में भाषा है, हमारे चलने भाषा है। किसी से बातचीत करना तो बस उस भाषा का एक उपयोग मात्र है। हम रास्ते में चल रहे हैं, कोई भी पदार्थ देखते हैं और उसके बारे में सोचने लगते हैं। अब ये सोचना किस में हो रहा है, वह भी तो किसी भाषा में ही सोचा जा रहा है। अगर सिर्फ और सिर्फ भाषा का कार्य विचारों का आदान-प्रदान करना होता, तो ज़रा सोचिए, इतने विपुल मात्रा में साहित्य का निर्माण हो पाता।
अतः हम भाषा की जिस परिभाषा को लेकर चलते हैं, वह हमे एक सीमित दायरे में रखता है। भाषा पर किसी का अधिकार नहीं है, भाषा किसी की वयक्तिगत संपत्ति भी नहीं है। भाषा हरेक व्यक्ति की अपनी है। हर व्यक्ति अपनी भाषा में सोचता है, अपनी भाषा में कल्पना करता है, अपनी भाषा में ही विचारों को रखता है, और अपनी ही भाषा में विचारो को ग्रहण भी करता है।
जब हम एक गुलाब का फूल देखते हैं तो वह हमे सुंदर लगता है, उसकी सुंदरता हम भाषा में ही व्यक्त करते हैं, लेकिन वही गुलाब किसी के आँखों में चुभता है और वह उसे पूंजीवादी का प्रतीक मान लेता है। दोनों ही अपनी अभिव्यक्ति भाषा में ही करते हैं। यहाँ सवाल है परिवेश का समाज का।
बच्चा भी किसी न किसी समाज और परिवेश से जुड़ा होता है, उसने जो कुछ भी उस समाज में रहकर अनुभव किया है, वह बन जाता है उसके भाषा का अंग। आप किसी भी तीन साल के बच्चे से बातचीत करके देख सकते हैं, अपने अनुभव में आए हर चीज़ के बारे में वह बात करने के लिए तैयार होगा। आप किसी भी बच्चे को ले लें, वह जानता है कि कौन सी बात किसे कहनी है। आपने कभी देखा है कि कोई बच्चा पिता से दूध पिलाने के लिए कहता हो, या माँ को घोड़ा बन जाने के लिए।
अर्थात भाषा प्रत्येक बच्चे की भी पहचान है। बच्चा जिस समाज में पलता उसी में जीता है, वह उस समाज के अनुरूप ही भाषा का निर्माण करता है।
अतः अब ज़रूरी है कि भाषा के लिए अनिवार्य कुछ बिन्दुओं पर चर्चा कर ली जाए :
भाषा और समाज : भाषा का निर्माण समाज में ही होता है। समाज ही भाषा के प्रयोग का पहला प्रयोगशाला  है, जहां उस समाज से जुड़ा व्यक्ति शुद्ध एवं परिमार्जित रूप में भाषा का प्रयोग कर सकता है। हर समाज की अपनी मान्यताएं होती है, अपना रिवाज होता है, उनकी भाषा उसके अनुरूप ही होती है, वहाँ का व्यक्ति उसी समाज के अनुरूप ही बोलेगा, क्योंकि उसी के अनुरूप वह सोचता है। इस कारण से आप देख सकते हैं कि खेती करने वाले लोगों की भाषा में किसानी से जुड़े श्ब्दावलियों का प्रयोग ज्यादा होगा वहीं कार्यालय में कार्य कर रहे लोग ज़्यादातर कार्यालयी शब्दों का प्रयोग करते दिखेंगे।
भाषा और अस्मिता : समाज के साथ हर व्यक्ति की अपनी एक पहचान होती है। व्यक्ति समाज के घेरे से निकल कर अपने बारे में भी कुछ विचार रखता है। यह अस्मिता हर किसी से जुड़ा हुआ है। कोई अपनी भाषा में उर्दू के शब्दों का प्रयोग करता हुआ दिख सकता है, तो कोई संस्कृत बहुल शब्दावली का प्रयोग करता हुआ नज़र आ सकता है। भाषा की तो पहचान ही यही है, एक ही भाषा में, एक ही समाज में कई कई तरह के प्रोक्ता हो सकते हैं। उन सभी प्रोक्ताओं का अपना सम्मान और स्वाभिमान है। मराठी हिन्दी, और मेरठी हिन्दी दोनों ही हिन्दी है, पर दोनों ही भाषाओं को बोलने वाले की अपनी एक खाश पहचान है जिसके आधार पर उन्हें पहचाना जा सकता है।
भाषा और लिंग : भाषा को प्रभावित करने वाला यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है। लड़कियों की भाषा में एक सौम्यता होती है, जो समाज ने उसे दी है, बहुत से ऐसे काम जो उसके लिए प्रतिबंधित है, इसलिए बहुत से ऐसे शब्द जिसे वह बोल नहीं सकती है। वही शब्द लड़के कहीं भी कभी भी बोलने के लिए आज़ाद है। पुरुष अपने बातों को लादने के लिए शब्दों का जाल बनाता है, उसकी भाषा में शासन करने वाला अधिकार होता है, जबकि परंपरा से परिवार को चलाने वाली स्त्री के शब्दों में दासता का भाव होता है। हालांकि अब हालात बादल रहे हैं, लेकिन कुछ शहरों को छोड़ दें तो अधिकांश जगहों पर अभी भी वही हाल है। स्कूलों में भी साफ सफाई के कामों के लिए लड़कियों को ही लगाया जाता है।
भाषा का आर्थिक आधार
आज जीवन-यापन के लिए सबसे आवश्यक वस्तु है धन अर्थात पैसा। पैसा जीवन की व्यवस्था को तय करता है। यह समाज में आपके औचित्य को प्रतिस्थापित करता है। यदि किसी के पास अफरात पैसा है, तो वह किसी भी समुदाय का सम्मानित व्यक्ति है। उसके बोल-चाल में जो अकड़ और आत्मविश्वाश होगा वह खाली जेब बाले इनशान के लिए मुश्किल है। आर्थिक रूप से सक्षम इंसान के नियंत्रण में बाज़ार है और आज का बाज़ार ही व्यक्ति का व्यक्तित्व निर्धारित करता है। जो बड़ा खरीदार है वह सभ्य समाज का नियामक है, जो नहीं खरीद सकता वह उस समाज के लायक नहीं है। प्रेमचंद की कहानी “पूस की रात” के नायक की विवशता यही है जब वह कंबल के लिए जुगाए पैसे को भी महाजन को देता है, तो उससे पहले वह अपनी पत्नी को मनाते हुये कहता है –“तो क्या गाली खाऊँ”। यहाँ यही दर्शाया गया है, कि गरीब लोग सिर्फ जीते हैं, और अमीर जीने के साथ लोगों को रौंदते भी हैं, और उनका यह रूप उनकी भाषा में भी झलकता है।
दूरदर्शन पर आने वाले कई विज्ञापनों को आप देखेंगे तो पता चल जाएगा कि यदि आप में उस कंपनी का सामान खरीदने का सामर्थ्य है तो आप बुद्धिमान हैं नहीं तो आप से बेबकूफ और कोई हो ही नहीं सकता है। अर्थ का यह अंतर भाषा पर विशेष प्रभाव डालती है।
भाषा और बड़े लोग
अक्सर समाज में यह कहते हुये सुना होगा बड़े सम्मानीय लोगों को कि तू तो अभी छोटा बच्चा है है तुझे बोलने का कोई हक़ नहीं है, तुम सिर्फ सुनो। या फिर माता-पिता के द्वारा बार-बार ये जतलाना कि मैंने तुम्हारे लिए क्या-क्या नहीं किया है और तुम मुझसे ज़बान लड़ते हो, अकसर इस तरह की धारणा बच्चों के भीतर एक तरह की संकीर्णता से भर देता है, कि वह तो बड़ों के सामने बोलने लायक ही नहीं है, इससे कई बच्चे जीवन प्रयंत बड़ों के सामने मुह भी नहीं खोल पाते हैं ।
भाषा और जातीयता
भारत तो सिर्फ जातीय आधार के लिए बदनाम है, यह विविधता हर कहीं पाया जाता है, कहीं गोरे-काले का भेद है तो कहीं कबीले के आधार पर अभी भी विभेद चल रहा है। ऐसे में तथाकथित तौर पर जो श्रेष्ठ है, उसकी भाषा दबंगई अंदाज़ की देखी जा सकती है। उदाहरण के तौर पर प्रेमचंद की कहानी “सद्गति” को देख सकते हैं। –“दुखी ने सिर झुकाकर कहा – “बिटिया की सगाई कर रहा हूँ महाराज! कुछ साइत-सगुन विचारना है। कब मर्ज़ी होगी?
पंडित घासीराम –“आज मुझे छुट्टी नहीं। हाँ, साँझ तक आ जाऊंगा।”
इन दोनों संवादों के आधार पर आप देख सकते हैं, एक की ध्वनि में कितनी दीनता है, और दूसरे की आवाज़ में कितना रौब है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भाषा के कितने रूप हैं, हर किसी के पास वह धरोहर के रूप में। यही जीवन का अलंकार है। बचपन में अकसर माँ कहा करती थी, कि यही मुह पान खिलाता है, तो यही मुह जूता भी खिलाता है। अर्थात भाषा वह लचीली चीज़ है, जो समाज, संस्कृति, जाति और अर्थ के आधार पर संचालित होती रहती है। हम जिस दायरे में हैं, लोग उसी दायरे में रहकर हमसे बोलने की उम्मीद करते हैं। ऐसे में कोई दायरा तोड़ कर निकलना चाहता है, उसे असामाजिक तत्व घोषित कर दिया जाता है। हम एक स्त्री से कल्पना नहीं कर सकते कि वह मर्दों की तरह बात करे, बच्चे से यह अपेक्षा रखते हैं, कि वह बस हमारी बातों का अनुसरण करके ही चले। ऐसे में भाषा बस एक पक्षीय हो जाता है, और कुछ नहीं।
विशेष अगले अंक में ___________________________________जारी है________________