शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

sabhyata tabah ho jati hai, school ke asfal ho jane se

सभ्यता तबाह हो जाती है : स्कूल के असफल हो जाने से

फर्ज़ कीजीय कि आप दिल्ली के व्यस्त सड़क पर खड़े हैं, वहाँ भीड़ लगी है, कुछ लड़के हाथ में चाकू लिए आते हैं और आपके आँखों के सामने ही एक लड़की को गोद-गोद कर मार डालते हैं। यह स्थिति आम है। इससे भी भयानक है, इंसान का अपने शोषण के खिलाफ आवाज़ न उठा पाना। यह बुज़दिली, यह डर हम सभी में आया कैसे? क्यों ऐसे हालत बने कि आज का आदमी इतना कमजोर हो गया है कि भीड़-भाड़ वाले जगह में भी, कोई आता है और महिलाओं के गले से सोने का चैन खींच कर ले जाता है? क्यों व्यक्ति इतना स्वार्थी, इतना अधीर हो गया है, कि अपनी मान्यता के खिलाफ़ एक शब्द नहीं सुन सकता है?शहर में होने वाली ऐसी कई अनेक घटनाए क्यों घटित हो रही है?
ऐसे प्रश्न जो मेरे ज़ेहन में हमेशा विद्यमान रहते हैं, उनके बारे में जानने का मौका मिला जॉन हॉल्ट” की किताब “असफल स्कूल” को पढ़कर। लेखक की लेख नुमा छपे लेखों को पुस्तक के रूप में शक्ल देकर इसे तैयार किया गया है। मेरे पास एकलव्य प्रकाशन के द्वारा प्रकाशित हिन्दी अनुवाद है इसके अनुवादक हैं “अरविंद गुप्ता” ।
पुस्तक का शीर्षक ही इतना बेहतरीन और रोचक है, जो किताब को पढ़ने से पहले रोमांचित भी करता है, असफल स्कूल, मतलब स्कूल का प्रशासन असफल है, स्कूल के शिक्षक असफल हैं, या बच्चे की असफलता को लेकर यह किताब है। यह पूरी किताब केवल उपरोक्त असफलता के बारे में ही नहीं बतलाती है, यह भी स्पष्ट करती है कि जब स्कूल के यह तंत्र असफल होते हैं तो परिणाम क्या निकलता है। आज जिन समस्याओं से हम घिरे हैं, वह हमारी शिक्षा व्यवस्था का असफल होना ही है।
निराशा के कोहरे में धकेलता है हमारा स्कूल :
एक छोटा नन्हा बच्चा अपने घर से, अपने परिवार से, अपने समाज से बहुत कुछ सीख कर जब स्कूल में प्रवेश करता है, तो उसके अपने ज्ञान को कोरा बता कर हमारे अध्यापक उसपर अपनी समझ को थोपने लगते हैं। इस प्रक्रिया में वह बच्चों की कल्पना, एवं सोचने समझने की शक्ति को ध्वस्त करते हैं और उन्हे उस शिक्षा को वहन करने के लिए तैयार करते हैं जो उनके अपने अनुभव की नहीं, किसी और के द्वारा अनुभव की गई बातों का संग्रह होता है।
दूसरे के द्वारा थोपी गई शिक्षा बच्चों में एक घुड़दौड़ को जन्म देती है, जो केवल परीक्षा आधारित होती  है, जिसमे बच्चों को किताब रूपी मशीन में घुली शब्द रूपी चटनी को इस कदर खिलाया जाता है कि वह समय आपने पर ज्यों के त्यों उल्टी कर दे। वह समय होता है परीक्षा की। इस परीक्षा का एक ही मकसद होता है ज्यादा से ज्यादा अंक प्राप्त करना जिसने शिक्षा का मकसद बस इतना ही सीमित कर दिया है कि पढ़ाई का मतलब कुछ सीखना-समझना नहीं है बल्कि केवल ज्यादा अंक प्राप्त करके पुरस्कार प्राप्त करना रह गया है। अंको का यह खेल बच्चों के जीवन को एक कमरे में बंद रहकर दूसरे से स्वयं को श्रेष्ठ बनाने के संघर्षों की ओर अग्रसर होने के लिए मजबूर करती है।
शिक्षा क्यों? :
यह एक जटिल प्रश्न बन गया है, कि शिक्षा क्यों होनी चाहिए? लेखक इस पर कहता है “नवयुवकों को अपनी शिक्षा से जिस चीज़ की ज़रूरत है और जो वे उससे चाहते हैं, वह है : पहले, अपने आसपास की दुनिया को बेहतर ढंग से समझना; दूसरे, अपने आपको विकसित करना; तीसरे, ऐसे काम कर पाना जिनमें वे अपनी विशेष रुचियों और कुशलताओं का इस्तेमाल करके आसपास की दुनिया की असली समस्याओं से जुड़ सकें और इंसानियत का भला कर सकें।”
परंतु छात्रों को इस प्रक्रिया से गुजरने कौन देता है? जन्म लेते ही वह परिवार की महत्वकांक्षा का पोषक बन जाता है। उसके व्यक्तिगत अनुभव को कहीं तब्ज़्ज़ो नहीं मिलती। उसे अपनी कल्पना, विचारों के लिए अपमानित होना पड़ता है जिससे उन्हे लगने लगता है कि सीखना और जीवन को जीना दो अलग-अलग चीज़े हैं। जिसका यह प्रभाव पड़ता है कि वह जो अपने जीवन में अनुभव करते हैं, वह बेकार की चीज़ है, वह तो कुछ जानते ही नहीं है, वह खुद को बेबकूफ मानने लगते हैं और शिक्षक को सर्वशक्तिमान।
यदि कल्पना पर ही प्रतिबंध है, तो समाज का विकास कैसे होगा? :
एक लड़का माँ को खाना बनाते देखता है, उसी समय पतीले के ढक्कन पर जाता है, और वह देखता है कि जब थोड़े से भाप के कारण ढक्कन उठ सकता है, तो बहुत सारे भापों से भारी सामान भी खींचा जा सकता है और वह वाष्प इंजन का आविष्कार करता है, कुछ ऐसी ही कहानी राईट बंधू की भी है, फूंकने पर यदि राख उड़ सकता है, तो सैकड़ों वार फूंकने पर इंसान भी उड़ सकता है, और वह बना डालते हैं हवाई जहाज। न्यूटन सेब को नीचे गिरते देखकर कई वैज्ञानिक तथ्यों को स्पष्ट करते हैं।
धरती पर बैठे लोगों ने दूर सितारों तक के रहस्य को ढूंढ ही नहीं निकाला आगे की ख़ोजों के लिए दुनिया को  प्रेरित किया। व्यक्ति की कल्पना ने ही साहित्य, कला और संस्कृति को जन्म दिया। यह व्यक्ति की कल्पना शक्ति ही थी कि आज हम अपने आपको आधुनिक कहते हैं। चाँद और ग्रहों पर उतरने की योजना बनाते हैं, दूसरे ग्रहों पर जाकर बसने की बात करते हैं। यह सब किसने किया? क्यों किया? उनसभी ने मानव की चुनौतियों को स्वीकार किया, उसे समझा जाना पहचाना, और निर्णय लेने की दिशा में आगे बढ़े। यदि उनकी कल्पना शक्ति पर यह कहकर प्रतिबंध लगा दिया जाता कि अगर “हम तुम्हें पढ़ना नहीं सिखाएँगे तो तुम उसे सीखोगे ही नहीं और अगर तुम हमारे बताए अनुसार नहीं करोगे, तब तो तुम कभी भी नहीं सीखोगे।
बात जब सिखाने की रह जाएगी तो बच्चा वही जान पाएगा, जो हम जानते हैं उससे अलग अपनी राह वह बना ही नहीं सकेगा। सभ्यता के विकास का अर्थ है कि जहां तक लाकर दुनिया को हमने खड़ा किया है हमारा भविष्य उससे बेहतर हो और इसे आगे ले जाने की ज़िम्मेदारी इन्हीं बच्चों पर है। 
बच्चों को केवल भाषण देना उनके व्यक्तित्व के साथ खिलवाड़ है :
स्कूल शिक्षा में भाषण को बहुत ही महत्व दिया जाता है। शिक्षक आएगा धाराप्रवाह बोलकर चला जाएगा। बच्चे सिर्फ सुनेंगे, यदि उन्होने बोलने का दुस्साहस किया तो उन्हे चुप करा दिया जाएगा, उनके प्रश्नो को सुना नहीं जाएगा। बच्चे केवल सुन सकते हैं। लगातार सुनते रहने की यह परंपरा बच्चों को सुनने की काला से ही विलग कर देती है। सुनते-सुनते वह अपनी बोलने की क्षमता को खो देते हैं, उन्हे हरवक्त इसका अहसास होने लगता है कि वह किसी मुद्दे पर कुछ बोल ही नहीं सकते, बोलेंगे भी तो गलत हो जाएगा, इसलिए जितना सुन सकते हो सुनलो प्रतिक्रिया मत दो।
भाषा तो नदी की धारा की तरह है जो स्वतंत्र होकर बहती है, उस भाषा पर ही नियंत्रण वक्ता लगा देते हैं, जिसका मकसद होता है, अपनी बातों को दूसरों तक पहुंचा देना, दूसरे के मंतव्य को न जानना। भाषा जो हरवक्त मानव के भीतर गूँजती रहती है, वह उस मेघ की तरह उमड़-घुमड़ का बरसना चाहती है, और जब उसे बोलने का मौका नहीं दिया जाता, तो बादल की ही तरह फट पड़ती है, और तब आता है प्रलय। भाषा को बोल कर या लिख कर अभिव्यक्त किया जाता है, लेकिन हमारे स्कूल में बच्चों को उतना ही बोलने दिया जाता है, जितना शिक्षक सुन सकें, उतना ही लिखने दिया जाता है जितना की शिक्षक जांच सकें। बच्चों की असीमित क्षमता शिक्षकों की महत्वकांक्षा की भेंट चढ़ जाती है और वह जीवन प्रयंत एक अवकुंठा के साथ जीने के लिए विवश हो जाता है।
स्कूल एक जेल की तरह है :
अब स्कूल में शासन है, नियम है, कानून है पर कहीं भी स्वछंदता का वह वातावरण नहीं है जिसमे बच्चे कुछ सीख सके। यहाँ बच्चों को अंको की जाल में इस कदर उलझाया जाता है, कि छात्र चापलूस और मक्कार बनने लगता है। उसके भीतर एक झूठे व्यक्तित्व का निर्माण होता है। वह जान लेता है, कि क्या करने पर शिक्षक उससे खुश रहेंगे और उसके अंको में इजाफा होगा। वह शिक्षकों को खुश रखने की हरसंभव प्रयत्न करता है।
स्कूल की इस व्यवस्था ने बच्चों को क़ैदी और शिक्षक को जेलर बना दिया है। शिक्षक अब पूरी तरह से विद्यालय को शोरमुक्त रखने के लिए अपनी ताक़त को झोंक देता है। जो बोलेगा, जो कहीं घूमेगा उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाएगी। विद्यालय में हर जगह शिक्षक के जासूस घूमते रहते हैं उसके हाथों में अधिकार होता है कि वह बच्चों की स्वतन्त्रता पर नज़र रखें। स्कूल छात्रों को चरित्र प्रमाण पत्र भी देता है, जिसके आधार पर बच्चे का भविष्य तय होता है। जिसके डर से बच्चों ने स्कूल के नियमो को इस कदर आत्मसात कर लिया है कि उन्हे लगने लगा है कि स्कूल में जो भी अत्याचार उनके साथ होता है, वह उनके भले के लिए ही है। शिक्षक भी यह अहसान दिखने से नहीं चूकते हैं, कि “अरे भाई हम जो कर रहे हैं, वह आपही के लिए तो कर रहे हैं।”
स्कूल के इस सोच ने शिक्षक को ज्ञान का प्रकाश बना दिया है, अब शिक्षकों को लगता है कि बच्चे अज्ञानता रूपी अंधकार में पल रहे हैं, उन्हे ज्ञान की रोशनी देने का अधिकार हमे ही, और इस चक्कर में वह छात्रों के व्यक्तित्व को ही जलाकर राख़ कर देते हैं।
सहभागिता को नष्ट करती शिक्षा :
शिक्षा जिसपर ज़िम्मेदारी थी विभिन्न तरह के सामाजिक विविधता को दूर करके सामाजिक समरसता को लाने की। परंतु जिसप्रकार से विद्यालय में उन छात्रों को विशेष निगाह से देखा जाता है, जिनके अकादमिक रिकॉर्ड अच्छे होते हैं। उससे एक वर्ग का छात्र अपने आपको बेहतर तथा दूसरे प्रकार के छात्र खुद को हीन  अनुभव करने लगते हैं। विद्यालय में बच्चो को अकेले रहने के लिए उकसाना, किसी से बात न करने देना। यहाँ तक कि लंच के समय भी अलग-अलग बैठ कर खाना खाना आपसी भाईचारे और सामाजिक संबंधो को कमजोर करती है। बच्चे एक दूसरे से बात करके ही एक दूसरे के करीब आते हैं, वहाँ यदि बच्चो को हरवक्त बोलने से रोका जाएगा, तो छात्र एक दूसरे के करीब कैसे आएंगे? जब स्कूल में ही बच्चों को एक दूसरे से बात नहीं करने दिया जाएगा, तो वह बात करने की कला कहाँ से सीखेंगे? कैसे वह एक दूसरे को अपना मानेंगे?

रही सही कसर पूरी कर देती है परीक्षा
परीक्षा वह खतरनाक मंज़र है जिसने छात्रों को पूरी तरह से पंगु बना दिया है। रटंत पद्धति की परीक्षा छात्रों के स्वतंत्र चिंतन को मार कर उनमे रटने की आदत का निर्माण करती है। सूचना का संग्रह और उसे निकाल देना, हमारी परीक्षा की सबसे सफल कहानी है। कोई भी यह जानने की कोशिश नहीं करता कि कौन कितना जनता है, बस इसी बात का ध्यान रखा जाता है कि वह कितना अंक पाता है। यही अंक निर्धारण करता है, छात्रों को आगे की विश्वविद्यालय का, यही अंक निर्धारण करता है, बच्चों के भविष्य का। अंको के जाल में उलझे हमारे देश के बच्चे यह भी नहीं जान पाते, कि वह जो पढ़ रहा था, या जो उसने पढ़ा, उससे जो भी ज्ञान मिला वह किसलिए था? अपनी और अपने समाज की समस्याओं को सुलझाने के लिए, या सिर्फ स्वयम को बाज़ार के मुताबिक़ तैयार करने के लिए। यदि वह शिक्षा केवल बाज़ार के लिए है, तो फिर हम एक सभ्य समाज की उम्मीद कैसे कर सकते हैं?
कुल मिलाकर यह किताब उन सभी समस्याओं की ओर हमारा ध्यान खींचती है, जिससे हम आजकल दो-चार हो रहे हैं। जिस छात्र को कभी बोलने नहीं दिया गया, जिस छात्र को नस्ल के आधार पर शिक्षा दी गई, जिसने कभी स्वतन्त्रता का अनुभव नहीं किया, जिसने कभी खुद को नहीं पहचाना वह देश समाज और प्रयावरण की बात कैसे करेगा?
जिस स्कूल ने जीवन प्रयंत छात्रों को डर कर जीने के लिए मजबूर किया है, उन बच्चों से हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में वह समाज की समस्याओं के लिए उठ खड़े होंगे?
यदि हम चाहते हैं कि बच्चे उस भविष्य के लिए तैयार हो जिसमे समानता, स्वतन्त्रता और न्याय हो तो पहले शुरुआत स्कूल से ही करनी होगी। बच्चों को खुद से सीखने के लिए प्रायप्त समय और माहौल देना होगा। उन्हे बुनियादी छुट देनी होगी, उनपर विश्वाश करना होगा। उन्हे चीखने-चिल्लाने की आज़ादी देनी होगी, उन्हे प्रश्न पूछने उसके उत्तर तक जाने की आज़ादी देनी होगी। शिक्षकों को बच्चों के अनुभव में शामिल होना होगा। किताब पढ़ने के लिए परीक्षा का खौफ हटाना होगा, नहीं तो छात्र बेमन से सिर्फ इसलिए ही उस किताब को पढ़ेंगे कि बस किसी तरीके से अच्छे नंबर मिल जाए। किताब से दोस्ती हो इसलिए चाहिए कि किताबों की रोचकता से शिक्षक बच्चों को अवगत करवाए।
बच्चों के अनुभव, उनकी दिनचर्या पर खुल कर चर्चा होनी चाहिए, जिसे वह दिनभर देखते हैं, जिसे वह महसूस करते हैं, उनकी आपसी चर्चा में ही देश समाज और प्रयावरण को शामिल करना चाहिए, जिससे वह अपने भीतर समीक्षातमक ज्ञान का निर्माण कर सकें। समाज की जटिलताओं पर बच्चो को खुल कर  बोलने का मौका देना चाहिए, जिसके माध्यम से छात्र स्वयम ही सही और गलत का निर्णय ले सकें। उस पर किसी और का अनुभव नहीं थोपा जाना चाहिए। बच्चों को अधिकार हो कि वह अपनी समस्याओं के बारे में खुल कर अपने विचार रखें, वह अपने समाज की कठनाई को बारे में जाने, उसपर सलाह मशवरा कर सकें।
स्कूल अनुशासन का केंद्र नहीं जीवंतता का स्थान हो, जिस छात्र अपनी जगह माने, उसे लगे कि वहाँ जाकर वह स्वतंत्र है, वहाँ वह खेल सकता है, नाच सकता है, गा सकता है, स्कूल को बच्चे का जीवन बनाना पड़ेगा, उसका दुश्मन नहीं। एक शिक्षा ही है, जो व्यक्ति को सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता देता है, अतः स्कूल की यह जेम्मेदारी है कि वह छात्रों को इस प्रकार के उन्हे अवसर दे जिनके माध्यम से वह शिक्षा के मूल भूत शर्तों को पूरा कर सके।
अंत लेखक के ही मंतव्य से करना चाहूँगा कि “यहाँ मूल सवाल काफी सरल है। क्या हम बच्चों को भीरु, आज्ञाकारी, डरपोक, कायर भेड़ों जैसा बनाना चाहते हैं या फिर मुक्त इन्सानों जैसा? अगर हमे भेड़ें चाहिए तो हमारे स्कूलों की वर्तमान हालत उसके लिए बिलकुल उपयुक्त है। और अगर हमें मुक्त इंसान चाहिए तो हमें कुछ बड़े-बड़े परिवर्तन करने होंगे।”




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