प्यास एक लौटे पानी की
माघ की त्रियोदशी की काली अंधेरी रात। ठंड के प्रकोप से सोया हुआ गाँव। अचानक रात्रि के बारह बजे, बिहारी बाली को प्यास लगी। अस्सी वरस का बूढ़ा सरीर। प्यास से गला सूखने लगा। पानी पिये तो कैसे। किसे कहेगी वह एक लोटा पानी देने के लिए। अपने बच्चे तो शहर मे जाकर बस चुके हैं, कोई कभी खबर भी नहीं लेता है।
कोई और पानी लाकर देगा भी कैसे, पूरे गाँव में डायन नाम से मशहूर जो है वो। प्यासे मन को मारकर सोने का प्रयास करने लगी। लेकिन नहीं, आँख मूँदते ही नदी, गंगा का दर्शन उसकी नींद उचट जाती। अभिलाषा बस वही कि कोई इस बेशरम ठंड की रात में एक लोटा पानी पीला दे।
जब प्यास हद से गुजरचूका तो उसने पड़ोस के भरथा को आवाज़ दी- "रे भरथा, रे बेटा एक लोटा पानी पीला दे। बाप रे बाप त्राहि त्राहि, भरथा की माँ लगी गड़ियाने उस बूड़िया को, ई डायन रात को जोग साध रही है, मेरे बेटे को बाली देने के लिए बुला रही है। है! महादेव इस बुढ़िया को नर्क मे भी जगह मत देना।
प्यास से व्याकुल वह बुढ़िया उठी खुद से लेकर पानी पीने के लिए। उठ तो गई, पर पैर न हिले उसके, शरीर को पूरी हिम्मत से जब उसने खींचने की कोशिश की कि गिरि धपाक से, दीवार से शिर टकराया खटाक।
भरथा की माँ रज़ाई के नीचे ही शिव का जाप करने लगी, पता नहीं ये डायन, चूड़ेल बुढ़िया कौन विपत्ति देगी। ये जोग रात्रि बीतेगी भी कि नहीं, उसने भगवान शिव से प्रार्थना की -"है! शिव रक्षा करो इस डायन के प्रकोप से।"
अगला दिन नर्क निवारण च्तुर्दशी का था, गाँव के लोग लोटा का लोटा जल शिवलिंग पर चढ़ा रहे थे, सबसे ज्यादा जल इसबर भरथा की मा ने चढ़ाया एकसौ आठ लौटा जल।
उधर एक लोटा जल की आस में मुंह बाए मारी परी बिहार वाली के लाश को गाँव वालों ने बाहर आँगन मे निकाल कर छोड़ दिया कि शहर से उसके बच्चे आकार उसे फूँक देंगे।
माघ की त्रियोदशी की काली अंधेरी रात। ठंड के प्रकोप से सोया हुआ गाँव। अचानक रात्रि के बारह बजे, बिहारी बाली को प्यास लगी। अस्सी वरस का बूढ़ा सरीर। प्यास से गला सूखने लगा। पानी पिये तो कैसे। किसे कहेगी वह एक लोटा पानी देने के लिए। अपने बच्चे तो शहर मे जाकर बस चुके हैं, कोई कभी खबर भी नहीं लेता है।
कोई और पानी लाकर देगा भी कैसे, पूरे गाँव में डायन नाम से मशहूर जो है वो। प्यासे मन को मारकर सोने का प्रयास करने लगी। लेकिन नहीं, आँख मूँदते ही नदी, गंगा का दर्शन उसकी नींद उचट जाती। अभिलाषा बस वही कि कोई इस बेशरम ठंड की रात में एक लोटा पानी पीला दे।
जब प्यास हद से गुजरचूका तो उसने पड़ोस के भरथा को आवाज़ दी- "रे भरथा, रे बेटा एक लोटा पानी पीला दे। बाप रे बाप त्राहि त्राहि, भरथा की माँ लगी गड़ियाने उस बूड़िया को, ई डायन रात को जोग साध रही है, मेरे बेटे को बाली देने के लिए बुला रही है। है! महादेव इस बुढ़िया को नर्क मे भी जगह मत देना।
प्यास से व्याकुल वह बुढ़िया उठी खुद से लेकर पानी पीने के लिए। उठ तो गई, पर पैर न हिले उसके, शरीर को पूरी हिम्मत से जब उसने खींचने की कोशिश की कि गिरि धपाक से, दीवार से शिर टकराया खटाक।
भरथा की माँ रज़ाई के नीचे ही शिव का जाप करने लगी, पता नहीं ये डायन, चूड़ेल बुढ़िया कौन विपत्ति देगी। ये जोग रात्रि बीतेगी भी कि नहीं, उसने भगवान शिव से प्रार्थना की -"है! शिव रक्षा करो इस डायन के प्रकोप से।"
अगला दिन नर्क निवारण च्तुर्दशी का था, गाँव के लोग लोटा का लोटा जल शिवलिंग पर चढ़ा रहे थे, सबसे ज्यादा जल इसबर भरथा की मा ने चढ़ाया एकसौ आठ लौटा जल।
उधर एक लोटा जल की आस में मुंह बाए मारी परी बिहार वाली के लाश को गाँव वालों ने बाहर आँगन मे निकाल कर छोड़ दिया कि शहर से उसके बच्चे आकार उसे फूँक देंगे।
Bahut achhe yesa lag raha hai munshi premchand ki wapsi ho gai
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